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पेजावर मठ के स्वामी के बयान मीडिया की सबसे बड़ी खबर बने हुए हैं। स्वामी जी बीजेपी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी के गुरु हैं और, वो कह रहे हैं कि आडवाणी जी ने उनसे संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की है। लेकिन, उन्होंने मना किया कि भारतीय राजनीति और बीजेपी को उनकी अभी बड़ी जरूरत है। अब लालकृष्ण आडवाणी अपने गुरु का कहा मानते हैं या अपने मन की- ये तो आने वाले दिन में ही पता चलेगा। लेकिन, क्या आडवाणी इतने असहाय-कमजोर और अकेले हो गए हैं कि खुद के राजनीति छोड़ने की बात कहने के लिए भी उन्हें अपने गुरु का सहारा लेना पड़ रहा है।
लगता ये है कि आडवाणी एक ऐसी भ्रमस्थिति के शिकार हो गए हैं जिसमें उनकी महत्वाकांक्षा और उनके मन के बीच का द्वंद न तो, उन्हें कुछ करने दे रहा है लेकिन, शांत भी नहीं बैठने दे रहा है। यही वजह है कि चुनाव हारने के बाद आडवाणी सक्रिय राजनीति से संन्यास की बात करने लगते हैं। नेता विपक्ष का पद छोड़ने की बात भी हुई लेकिन, ये द्वंद ही था कि जब वो, विपक्ष का नेता बने रहने के लिए मान गए तो, उन्होंने बयान दे दिया कि वो, फिर से देश भर की यात्रा करेंगे और भाजपा कार्यकर्ताओं से हार की वजह जानेंगे और भाजपा को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश करेंगे। देश के सबसे सफल रथयात्री की ये यात्रा अगर होती भी है तो, शायद ही राजनीतिक तौर पर इसका कोई महत्व इतिहास दर्ज करेगा।
दरअसल, 2009 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा में इस कदर बवंडर मचा कि पार्टी के टूटने-संघ के नई भाजपा बनाने तक की चर्चा शुरू हो गई और सबके केंद्र बिंदु में लालकृष्ण आडवाणी ही थे। यानी साफ है कि ऐसे कमजोर, असहाय नहीं थे और न हैं जितनी मीडिया और खुद भाजपा के ही एक वर्ग में लगातार चर्चा हो रही है। सच्चाई तो ये है कि भाजपा में भले ही इस बात की चर्चा बल पा गई है कि अब अटल-आडवाणी युग से भाजपा को आगे बढ़ाने के समय आ गया है। लेकिन, उस आगे बढ़ाने में बागडोर थामने वाला कोई नेता है ही नहीं। और, जिनके नाम आ रहे हैं वो, ये चाहते हैं कि आडवाणी उनके सिर पर हाथ रखकर कह दें कि वही उनका असली उत्तराधिकारी है। आडवाणी के भक्त के तौर पर बयान देने वाले और आडवाणी को ही लोकसभा चुनाव की हार का दोषी मानने वाले दोनों ही खेमे दरअसल अभी भी इतना साहस नहीं रख पा रहे हैं कि वो, आडवाणी से इतर भाजपा की कल्पना भी कर लें।
आडवाणी के दो प्रमुख सिपहसालार- सुधींद्र कुलकर्णी और जसंवत सिंह- पार्टी से बाहर जा चुके हैं। तो, एक जमाने में आडवाणी के मुरीद दिग्गज पत्रकार अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा पार्टी में रहकर भी आडवाणी पर लगातार निशाना साध रहे हैं। तो, क्या आडवाणी की अभी और किरकिरी होनी बाकी है। कम से कम अटल बिहारी वाजपेयी की अस्वस्थता ने उनकी किरकिरी होने से तो बचा ही ली है। लेकिन, अटल-आडवाणी युग से आगे निकलने का साहस भाजपा में शून्य है। ये इससे साफ समझ में आता है कि अभी महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के ऑडियो-वीडियो कैसेट जनता से भाजपा के लिए वोट मांगेंगे। अब अटल जी तो, भाजपा के लिए इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकते हैं। लेकिन, आडवाणी के पास एक बड़ा मौका है जो, इस रथयात्री की अंतिम राजनीतिक यात्रा को शानदार बना सकता है।
दरअसल अभी भी भाजपा कार्यकर्ता पूरे देश में अगर किसी एक नेता के कहने पर कुछ भी करने को तैयार हो सकते हैं तो, वो लालकृष्ण आडवाणी ही हैं। हो सकता है कि अभी इसमें बहस ये हो कि इतना ही होता तो, भाजपा चुनाव जीत गई होती और भाजपा के लौहपुरुष प्रधानमंत्री बन गए होते लेकिन, ये तर्क इसलिए गलत लगता है कि आडवाणी के नेतृत्व वाली भाजपा ने इतना भी खराब प्रदर्शन नहीं किया जितना मीडिया और राजनीति समाज में हल्ला हुआ। 116 सांसद लोकसभा में इतने भी कम नहीं होते। लेकिन, जिस तरह से आडवाणी के राजनीतिक सलाहकारों ने इस चुनाव को आडवाणी के राजनीतिक जीवन की अंतिम लड़ाई जैसा पेश कर दिया था उसमें हारने के बाद आडवाणी हारे हुए योद्धा अपने आप ही साबित हो गए। फिर क्या था जिसे देखो हर किसी ने आडवाणी को सत्ता लोभी तक घोषित कर दिया।
लेकिन, थोड़ा सा पीछे जाकर देखें तो, ये लालकृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होंने हवाला कांड में अपना नाम भर आने पर लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। सोनिया तो, त्याग की मूर्ति बन गई हैं लेकिन, आडवाणी के राजनीतिक जीवन का अंत सत्तालोलुप बने होता दिख रहा है। ये तो सर्वविदित तथ्य है कि उस दौर में संघ के सबसे प्रिय स्वयंसेवक होने के बावजूद आडवाणी ने खुले तौर पर कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी को बौना साबित करने की कोशिश कहीं नहीं की। सर्वमान्यता की वजह से भले वाजपेयी स्वयंसेवक प्रधानमंत्री बन गए लेकिन, सच्चाई यही है कि पूरे देश का भाजपा कार्यकर्ता आडवाणी को ही नेता मानता-जानता था।
अब आडवाणी के पास एक बड़ा मौका है। लेकिन, इसके लिए आडवाणी को अपना मन बड़ा करना होगा। और, अपने मन से निकली देश भर के भाजपा कार्यकर्ताओं से बात की इच्छा को अमली जामा पहनाने की रणनीति बदलनी होगी। रणनीति बस इतनी कि इस यात्रा की शुरुआत से पहले उन्हें चुप्पी तोड़नी होगी। उन्हें खुद बोलना होगा। अपने गुरु, अपने सलाहकारों के मुंह से अपनी मंशा व्यक्त करने के बजाए पुराने लौह पुरुष को सामने आना होगा। लेकिन, राजनीति के इस प्रयोगधर्मी नेता को एक और प्रयोग करना होगा। आडवाणी का राजनीति से संन्यास लेकर राजनीति की नई परिभाषा गढ़नी होगी। अब समय ये है कि आडवाणी भाजपा के अभिभावक बनें लेकिन, ऐसा अभिभावक जो, बिना किसी इच्छा के अपने बच्चों को उनके लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता। लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति की ऐसी शख्सियत नहीं हैं कि गुमनामी में राजनीतिक पारी का अंत हो जाए। आडवाणी जी एक नया प्रयोग आपका इंतजार कर रहा है ये बड़ा मौका है आप बोलकर तो देखिए देश आपको अभी भी सुनने को तैयार है। आपके गुरु जी की ये बात एकदम सही है कि भारतीय राजनीति और भाजपा को आपकी अभी बहुत जरूरत है। लेकिन, थोड़ा बदले रोल में …

7 Comments

pankaj mishra · October 4, 2009 at 11:26 am

bilkul shai hai bhaisaab ab dekna ye hai ki kya aadwaani ji mauke ka faida utha pate hai ki nahin.

Arvind Mishra · October 4, 2009 at 2:13 pm

भारतीय जनमानस में त्याग को सहज ही गद्दी मिल जाती है -आडवानी यह बात भूल गए ! अच्छा विवेचन किया है आपने !

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey · October 4, 2009 at 2:55 pm

अभी शायद अडवानी की पारी खल्लास नहीं हुई है। पर कोई भविष्यवाणी या तो ज्योतिषी कर सकते हैं या मीडिया!

Sudhir (सुधीर) · October 4, 2009 at 2:55 pm

….अटल-आडवाणी युग से आगे निकलने का साहस भाजपा में शून्य है।

उचित एवं सार्थक विवेचन…पूर्ण सहमति

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) · October 4, 2009 at 5:58 pm

आडवाणी जी की स्वीकार्यता बहस का मुद्दा हो सकती है, लेकिन उनका देश की नब्ज टटोलने का अनुभव अगाध है, यह सत्य है।

मैं शिक्षा-दीक्षा से तो संघी हूँ और उम्र के तकाजे से सम्प्रति कम्युनिस्ट… कुल जमा शून्य बटे सन्नाटा। लेकिन अपनी सोच तो यही कहती है कि भाजपा का भविष्य घोर अंधकारमय है।

सचिन, गाँगुली, द्रविड़ आज भी बहुतों से बेहतर खेल सकते हैं, लेकिन समय रहते उनका रिप्लेसमेंट न ढूँढा जाय तो भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित नहीं हुआ जा सकता।

पी.सी.गोदियाल · October 5, 2009 at 4:27 am

आडवानी जी की सबसे बड़ी कमी यह रही, जो मैं समझता हूँ, की काम उठाये तो इन्होने बहुत लेकिन इमानदारी से पूरा एक भी नहीं किया, उसके पीछे चाहे कारण जो भी रहा हो !

Rakesh Singh - राकेश सिंह · October 5, 2009 at 4:29 am

हर्ष जी आपकी बातों से सत-प्रतिसत सहमत हूँ | शानदार विश्लेषण किया है, कुछ पत्रकार हैं जो ऐसा ही विचार रखते हैं पर कहने की हिम्मत नहीं ….

धन्यवाद | आभारी हूँ ..

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