पाकिस्तान में कितने लोकतांत्रिक तौर पर चुने गए जनप्रतिनिधियों ने सत्ता संभाली और कितने तानाशाहों ने इस मुल्क पर राज किया। या फिर कितनी बार चुनाव हुए और कितनी बार वहां तख्त पलट कर-आपातकाल लगा। दोनों की ही गिनती लगभग बराबर ही निकलेगी। यहां तक कि लोकतांत्रिक सरकार से ज्यादा समय पाकिस्तान में तानाशाहों का शासन रहा। शायद यही वजह है कि पाकिस्तान सिर्फ एक मुल्क न रहकर दुनिया के लिए दहशत बन गया है।
पाकिस्तान की तानाशाही हुकूमतों ने वहां के लोगों के अधिकारों को इस तरह से कुचला है कि अब तो, वहां आपातकाल कोई बड़ी घटना जैसी भी नहीं लगती। लेकिन, अगर पाकिस्तान के सबसे कमीने तानाशाह शासक की बात होगी तो, मुशर्रफ पहले के सभी तानाशाहों को पानी पिला देंगे। यही वजह है कि मुशर्रफ के दांव के आगे पूरी पाकिस्तानी राजनीति चारों खाने चित्त हो गई है। मुशर्रफ ने पाकिस्तान में चरमपंथी (जिन्हें भारत में पिछले 60 साल से आतंकवादी बनाकर भेजा जाता रहा है) और न्यापालिका की अनावश्यक दखलंदाजी को आपातकाल लगाने की वजह बताया है। बेनजीर कह रही हैं ये आपातकाल नहीं मार्शल लॉ है। 
अब मुशर्रफ और बेनजीर इमरजेंसी और मार्शल लॉ पर क्यों लड़ रहे हैं। दरअसल ये पाकिस्तान की मुशर्रफ शैली की राजनीति की वजह से है। मुशर्रफ एक ऐसे तानाशाह हैं जो, बार-बार दुनिया के अलग-अलग मंचों से ये जाहिर करने की जी भरके कोशिश करते रहे हैं कि वो लोकतंत्र बहाली और पाकिस्तान में अमन चाहते हैं। मुशर्रफ अपने को वर्दी में लोकतंत्र का रक्षक साबित करना चाहते थे। इसीलिए अब मुशर्रफ इमरजेंसी कहकर देश के हितों का हवाला देकर राज करना चाहते हैं। जबकि, बेनजीर इसे मार्शल लॉ यानी सेना का राज बताकर देश की अवाम को लोकतंत्र बहाली के लिए मुशर्रफ के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार करना चाहती हैं।
इन सबके बीच में हैं नवाज शरीफ जो, लंदन से इस्लामाबाद फतह करने निकले थे। लेकिन, शायद उनसे ज्यादा चालाक मुशर्रफ निकले। मुशर्रफ ने उन्हें बैरंग सऊदी पहुंचा दिया। शरीफ के समर्थक शरीफ के आसपास फटक तक नहीं पाए। वहीं जब बेनजीर ने मुशर्रफ से एक गुप्त समझौता किया तो, मुशर्रफ ने दुनिया को दिखाने के लिए बेनजीर को वतन वापसी का मौका दिया। और, उनके समर्थकों को जश्न मनाने का भी। लेकिन, ये जश्न मातम में बदल गया। जब, बेनजीर पर हुए आत्मघाती हमले में 150 से ज्यादा लोगों की जानें चली गईं।
दुनिया भर के टीवी चैनल के कैमरे दो दिन तक पाकिस्तान पर ही टिके रहे। एक बार शरीफ को बैरंग लौटाने वाले दिन। दूसरी बार बेनजीर के स्वागत और फिर मातम में बदलने के दिन। लेकिन, अगर दोनों दिनों के घटनाक्रम, टीवी पर दिख रही तस्वीरों को ध्यान से याद करें तो, साफ था कि पाकिस्तान में आपातकाल जैसा माहौल तो मुशर्रफ ने पहले ही तैयार कर रखा था। लेकिन, वो अमेरिका और दूसरे देशों के सामने ये साबित नहीं होने देना चाहता था कि वो लोकतंत्र विरोधी है। शरीफ ने मुशर्रफ के खिलाफ जेहादी बनने की कोशिश की थी। जबकि, बेनजीर शरीफ के बाहर जाने के बाद लोकतंत्र की उम्मीदों को जिंदाकर फिर से सत्ता हथियाना चाहती थीं। लेकिन, जब पाकिस्तान पहुंचने से ठीक पहले बेनजीर के सुर थोड़े बदलते दिखे तो, मुशर्रफ को फिर से आपातकाल की याद आई।
वैसे, मुशर्रफ ने अपनी जिंदगी में कितने भी झूठ बोले हों। आपातकाल लगाने की दोनों वजहें एकदम सही बताई हैं। मुशर्रफ को ये गुमान था कि चरमपंथ उनके कहे के मुताबिक चलेंगे। और, जब वो जितना जेहाद फैलाने का आदेश देंगे, उससे आगे कुछ नहीं होगा। जब ये भ्रम टूटने लगा तो, मुशर्रफ को गद्दी पर खतरा दिखने लगा। उस पर जब, जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को मुशर्रफ ने चीफ जस्टिस के पद से हटाया तो, चौधरी पाकिस्तान में लोकतंत्र के नायक बन गए। दोनों मोर्चों पर मात खा रहे मुशर्रफ ने बेनजीर से गुप्त समझौता करके एक और दांव खेलने की कोशिश की। लेकिन, जब वो दांव भी बेकार गया तो, मुशर्रफ ने अपनी वो ताकत आजमाई जिसके बूते उन्होंने पहली बार लोकतंत्र को ठेंगे पर रखा था। आपातकाल की तैयारी में ही मुशर्रफ ने ISI चीफ हामिद गुल को बेदखल कर दिया था। शायद हामिद गुल के मन में भी कुछ तानाशाही विचार आने लगा था। यही वजह है कि आपातकाल लगते ही नेताओं के अलावा गिरफ्तार किए गए लोगों में हामिद भी शामिल है। इमरान खान नजरबंद हैं। अब तक ढेर सारे वकील और लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता जेल पहुंच चुके हैं। लेकिन, सवाल ये है कि क्या 1999 में जब नवाज शरीफ की सत्ता पलटी थी। उसी तरह से मुशर्रफ आसानी से सत्ता हथियाकर हीरो बन जाएंगे।
मुझे लगता है कि इस बार मियां मुशर्रफ के लिए मुश्किलें ज्यादा हैं। पाकिस्तान में एक बड़ी जमात अमेरका-ब्रिटेन में रह रही है। वो, तरक्की चाहती है। उसे पाकिस्तान के भ्रष्ट नेताओं पर भरोसा कम ही है। लेकिन, इफ्तिखार चौधरी इस वर्ग के नए नेता बन गए हैं। आपातकाल के ऐलान के बाद इस नए पाकिस्तानी मुसलमानों की बदलती आवाज पर इंटरनेट पर साफ सुनी जा सकती है। ये साफ है कि मुशर्रफ के फिर से राष्ट्रपति पद के चुनाव जीतने पर सुप्रीमकोर्ट रोक लगाने वाला था। और, मुशर्रफ विरोध का जज्बा पाकिस्तान में कितना काम कर रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इफ्तिखार चौधरी के अलावा 8 दूसरे जजों ने भी आपातकाल लगाने का मुशर्रफ का आदेश मानने से इनकार कर दिया।
पूरे पाकिस्तान में सेना असीमित अधिकार के साथ सड़कों पर है। नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए हैं। संविधान बर्खास्त कर दिया गया है। निजी न्यूज चैनल बंद कर दिए गए हैं। मीडिया के दफ्तरों पर सेना तैनात है। लेकिन, सड़कों पर मुशर्रफ विरोध करने वाले उतर रहे हैं। वकीलों का एक बड़ा जत्था मुशर्रफ विरोध की अगुवाई कर रहा है। सेना में भी एक बड़ा जत्था मुशर्रफ के खिलाफ है। हामिद गुल उस गुट के नेता बन रहे थे। जस्टिस वजीहुद्दीन अहमद की मानें तो, सेना का बड़ा हिस्सा उनके साथ है। अहमद मुशर्रफ के खिलाफ राष्ट्रपति का चुनाव लड़ चुके हैं। अहमद कह रहे हैं कि आने वाले दिनों में पाकिस्तान दुनिया को चौका देगा। क्योंकि, सेना का बड़ा हिस्सा मार्शल लॉ नहीं कानून का राज चाहता है। अब अहमद की बात कब सही हो पाएगी ये तो, पता नहीं। लेकिन, ये होना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि, पाकिस्तान में इस तरह के तानाशाही शासकों की वजह से ही पाकिस्तान दुनिया में दहशत फैलाने वाला मुल्क बनकर रह गया है। पाकिस्तान पूरे इस्लाम के लिए गाली बन गया है। पाकिस्तानी तानाशाहों की ही काली करतूतें हैं कि लंदन, न्यूयॉर्क से दिल्ली तक मुस्लिम जेहाद (आतंकवाद) का पर्याय भर बनकर रह गए हैं। किसी भी एक आतंकवादी घटना पर पाकिस्तानी ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में रह रहे भारतीय मुसलमान भी शक की नजर से देखे जाते हैं। इसलिए इस्लाम, पाकिस्तान और खासकर भारतीय मुसलमानों के हक में है कि जल्द से जल्द मुशर्रफ की तानाशाही पर रोक लगे।
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का नाम देकर अमेरिका ने इराक को तबाह कर दिया। सद्दाम को फांसी चढ़ा दी। लेकिन, सच्चाई यही है कि इराक से आज तक किसी भी आतंकवादी को मदद की बात सामने नहीं आई है। न ही सद्दाम के राज में लादेन का आतंक इराक के रास्ते राज करता था। इराक अपने पड़ोसी देशों की परिस्थिति के लिहाज से उस तरह तैयार हुआ और वहां के जातीय संघर्ष में सद्दाम जैसा तानाशाह बना। लेकिन, सद्दाम की तानाशाही से खतरनाक मुशर्रफ की ये तानाशाही है क्योंकि, एक बार फिर से पाकिस्तान जेहादियों के लिए जन्नत बन सकता है। भारत के लिए ये सबसे ज्यादा चिंता की बात है। क्योंकि, इस्लाम विरोधी का तमगा हटाने के लिए मुशर्रफ जेहादियों को फिर से मदद देना शुरू कर सकते हैं। सर्दियों की शुरुआत हो रही है वैसे भी इस समय पाकिस्तानी फौज की गोलाबारी की आड़ में अक्सर जेहादी भारत में घुसते रहे हैं। डोडा में धारा 144 लगाई जा चुकी है। पाकिस्तान में आपातकाल के ऐलान के तुरंत बाद से सेना और पुलिस हाई अलर्ट पर है। ऐसे में भारत में स्थिरता के लिए भी जरूरी है कि पाकिस्तान में किसी भी तरह लोकतंत्र की बहाली हो सके।

3 Comments

परमजीत बाली · November 4, 2007 at 7:23 pm

सही विचार प्रेषित किए है …बात विचारने योग्य है

Gyandutt Pandey · November 4, 2007 at 11:52 pm

मुशर्रफ सद्दाम से ज्यादा खतरनाक हैं – वाकई? आपका आकलन तो आगे राजनैतिक घटना क्रम को देखना रोचक बना देगा!

Udan Tashtari · November 5, 2007 at 2:18 am

सही विचार हैं.

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