आज मुंबई में एक यात्री लोकल ट्रेन के ऊपर लगे बिजली के तारों से बुरी तरह झुलस गया। 25 हजार वोल्ट का करेंट छूने के बाद वो यात्री ट्रेन के ऊपर ही गिर गया। वो, बुरी तरह जल गया। उसके शरीर से धुंआ निकल रहा था। विजुअल मिल गए थे लोगों को खींचने वाले थे इसलिए टीवी चैनल पर भी ये खबर दिखाई जा रही थी और लगातार चेतावनी भी दी जा रही थी। लेकिन, सवाल ये है कि क्या किसी को शौक हो सकता है कि लोकल ट्रेन की छत पर चढ़कर सफर करे। मुंबई मुझे रहते हुए तीन साल हो गए हैं। लेकिन, अभी भी छोटी सी दूरी के लिए भी लोकल से सफर करने की हिम्मत नहीं पड़ती। कभी हिम्मत की भी तो, ट्रेन पहुंचते-पहुंचते दुबारा लोकल पर न चढ़ने की सौगंध भी खाई। ये अलग बात है कि कई बार मजबूरी में ये सौगंध टूटती भी है। लेकिन, लोकल पर थोड़ बहुत चलने और स्टेशन पर खड़े कई लोकल गुजर जाने के अनुभव से इतना तो साफ है कि लोकल की ट्रेन पर सफर करने वाला शाकिया ये हरकत नहीं करता।

अब सवाल ये है कि अगर देश की अकेली मायानगरी में रहने वालों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी सरकार नहीं दे पा रही है तो, फिर मुंबई को देश का आर्थिक राजधानी होने का तमगा कैसे मिल सकता है। हर दूसरे दिन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख मुंबई को शंघाई बनाने का सपना दिखाते रहते हैं। लेकिन, इस शहर मे रहने वाले लोगों को चलने के लिए लोकल ट्रेन तक की सुविधा नहीं मिल पा रही है। मैं जब 3 साल पहले इस शहर में नौकरी करने के लिए आया था तो, एक दिन बांद्रा से लोवर परेल पहुंचने पर ट्रेन से कटकर एक आदमी की जान जाते देखी। मुझे इस घटना ने झकझोर दिया था। लेकिन, उधर से गुजर रहे लोग लाश को एक नजर देखने भर की संवेदना भी नहीं जुटा पा रहे थे। ऑफिस में आकर मैंने कहा कि ये तो खबर है तो, बताया गया कि कैसी बात कर रहे हो यहां, हर रोज लोकल से कोई न कोई गिरकर या मर जाता है। या फिर किसी का हाथ पैर टूट जाता है। ये तो, सामान्य बात है। मुंबई की इस लाइफलाइन से जिंदगी जाने को इस तरह से सामान्य घटना होना सुनकर मुझे तगड़ा झटका लगा था। लेकिन, उसके बाद जब मैंने ध्यान से यहां के अखबारों को देखना शुरू किया तो, लगा कि ऑफिस के लोग सही ही कह रहे थे। अब सवाल ये है कि क्या रेलवे सिर्फ लोगों को सावधान करने भर की बात कहकर बच सकता है। प्रशासन और रेलवे आखिर लोगों को ट्रेन पर अपनी जान जोखिम में डालने से क्यों नहीं रोक पाता। मुंबई में सड़क के रास्ते से जाने की इच्छा रखने वालों को भी मायूसी ही हाथ लगती है। किसी भी सड़क से उतनी ही दूरी तय करने पर ट्रेन से दुगुना समय तो, लगता ही है। जेब भी काफी ढीली हो जाती है। अब टैक्सी-ऑटो का खर्च बर्दाश्त करना सबके बस का तो नहीं ही है।
यहां जिंदगियां कैसे जी जा रही हैं।

इसका अनुपम उदाहरण सुबह-सुबह किसी भी फ्लाईओवर के नीचे देखा जा सकता है। मैं सुबह ऑफिस जाता हूं तो, बिग बाजार से शुरू होकर एंपायर कॉम्प्लेक्स के सामने खत्म होने वाले फ्लाईओवर के नीचे सैकड़ो लोग सो रहे होते हैं। इतना ही नहीं। सड़के के किनारे खड़ी ज्यादातर टैक्सियों का दरवाजा खुला दिखता है। इन सभी टैक्सियों में कोई न कोई सो रहा होता है। इनकी भी मजबूरी है क्योंकि, इनमें से किसी के पास भी रहने के लिए एक कमरे की जगह भी नहीं है। अब क्या ये सरकार की जिम्मेदारी में शामिल नहीं है। अगर शामिल नहीं है तो, फिर सरकार क्या सिर्फ सत्ता का सुख लूटने के लिए चुनी जाती है। ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां … जरा हटके जरा बचके … ये है मुंबई मेरी जां … ये लाइनें लिखते वक्त शायद ही लिखने वाले को मुंबई की इस मुश्किल का अहसास रहा होगा। लेकिन, इस शहर में रहने वाले सचमुच जरा हट के … जरा बचके के ही अंदाज में अपनी जिंदगी बिता रहे हैं। पता नहीं ये रास्ता कितना कारगर है। लेकिन, जब यहां लोगों को इस तरह से मौत के हाथों हारता हुआ देखता हूं तो, लगता है कि शिवसेना का अतिवादी सुझाव क्यों न मान लिया जाए। मुंबई शहर में बाहर से आने वालों पर रोक लगाई जाए। लेकिन, ये समस्या का सही निदान तो नहीं ही है।
वैसे, इस तरह की दुर्घटनाओं से बेखबर मुंबई अपनी रफ्तार में भाग रही है। लोकल ट्रेन के ऊपर बिजली के तार से छूकर जलने वाले का किस्सा 2-4 दिन लोकल में चलने वालों का टाइमपास बनेगा और कुछ दिन बाद डिब्बे की दमघोंटू भीड़ से बचने के लिए लोकल की छत पर चढ़ेगा। और, फिर से खबर भर बनकर रह जाएगी। लेकिन, संवेदना खोते लोग इसे मुंबई की जिंदादिली कहकर भुला देना चाहेंगे। जबकि ये कहने वाले भी जानते हैं कि ये जिंदादिली सिर्फ मजबूरी की ही है।


6 Comments

बाल किशन · November 2, 2007 at 11:23 am

बात तो आप सच ही कह रहे है पर रास्ता भी तो नज़र नही आता?

mamta · November 2, 2007 at 12:22 pm

शायद इसीलिए मुम्बई को मायानगरी के साथ-साथ हादसों का शहर भी कहा जाता है।

आशीष · November 2, 2007 at 1:06 pm

daliy ise se aaa jaakar main bhi tang aa gya hoon sir

अनिल रघुराज · November 2, 2007 at 1:56 pm

बात लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही का है। अगर यही घटना किसी विकसित देश में घटी होती तो इस पर वहां की लोकल सरकार तो गिर ही गई होती। लेकिन अपना लोकतंत्र वाकई बड़ा कच्चा है। अंग्रेजों से मजबूरी में मिला लोकतंत्र आज लोक की मजबूरी बन गया है। लेकिन लोकतंत्र में संभावनाएं अनन्त हैं। उसका कोई विकल्प नहीं हैं।

Sagar Chand Nahar · November 2, 2007 at 2:54 pm

क्या लोकल ट्रेन या बस बढ़ा देने से इस समस्या का इलाज हो जायेगा? मुझे लगता है कि परिवहन के साधन बढ़ने से तो ट्रेफिक और भी ज्यादा बढ़ेगा।
आखिर फिर क्या हल हो, कुछ समझ में नहीं आता!
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

हर्षवर्धन · November 3, 2007 at 1:28 am

ये सिर्फ कुछ ट्रेन या बस या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के दूसरे साधन बढ़ान भर की बात नहीं है। ये सवाल है उस सरकारी पॉलिसी का जो, अब तक देश में शहरों के सही विकास की नीति नही तैयार कर पाई है। और, शहरों में ही सारे मौके होने से गांव में कोई सुविधा नहीं मिल रही तो, गांव खाली हो गए हैं। और, शहर में बढ़ती सुविधा के बावजूद सड़ांध शुरू हो गई है।

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