भारी भरकम शरीर वाले नितिन गडकरी का भाजपा अध्यक्ष बनना कई मायनों में एतिहासिक है। वैसे तो नितिन गडकरी संघ के पूर्ण आशीर्वाद की वजह से ही उस कुर्सी पर बैठ पाए हैं जिस पद के जरिए अटल बिहारी वाजपेयी-लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जैसे भाजपा के दिग्गजों ने पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे तक पहुंचा दिया और, कांग्रेस का विकल्प भाजपा बन गई। गड़करी सिर्फ 52 वर्ष के हैं और भाजपा के इतिहास में सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। गडकरी मराठी हैं और संघ मुख्यालय नागपुर में होने के बावजूद पहली बार संघ ने किसी मराठी के लिए प्रतिष्ठा लगाई है।
इतनी एतिहासिक परिस्थितियों में कुर्सी संभालने वाले गडकरी अब आगे इतिहास बनाएंगे या खुद इतिहास में ठीक तरीके से दर्ज भी नहीं हो पाएंगे। गडकरी का नाम जब राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए पहली बार सामने आया था तो, राष्ट्रीय मीडिया में एक सुर था– मरती भाजपा के लिए आत्मघाती कदम। राज्य स्तर के नेता को राष्ट्रीय दर्जा देने की संघ की कोशिश की खूब आलोचना हुई थी। लेकिन, गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही गडकरी के लिए फ्लाईओवर मैन, विकास पुरुष जैसे नारे सुर्खियां बन गए। टीवी चैनलों पर गडकरी का स्कूटर से वोट डालने वाला दृष्य भी खूब दिखाया। गडकरी को इस चुनौती को समझना होगा। मीडिया से संबंध बेहतर रखें लेकिन, सिर्फ और सिर्फ काम करना होगा। भाजपा की जगह आज भी है लेकिन, माहौल अच्छा नहीं है। खुद की राष्ट्रीय छवि तैयार करनी होगी।
गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि वो, दिल्ली दरबार के उन माहिर खिलाड़यों को पटकनी देकर भाजपा के मुखिया बने हैं जो, पिछले एक दशक से दिल्ली की राजनीति का रास्ता बनाते बिगाड़ते रहे हैं। भले ही आंतरिक संतुलन बनाए रखने के लिए आडवाणी को घर के बड़े बुजुर्ग जैसे भाजपा संसदीय समिति के चेयरमैन का पद दे दिया गया और सुषमा को लोकसभा और जेटली को राज्यसभा में भाजपा का मुखिया बना दिया गया। लेकिन, सच्चाई यही है कि ये दोनों नेता खुद को आडवाणी के बाद पार्टी के स्वाभाविक मुखिया के तौर पर देख रहे थे। यहां तक कि गडकरी की ताजपोशी के पहले तक पार्टी कार्यकर्ता भी इन्हीं में से किसी की ताजपोशी तय मान रहे थे। इसीलिए जब गडकरी का नाम तय हो गया तो, सुषमा स्वराज ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने और भाजपा के कुछ दूसरे नेताओं ने अध्यक्ष बनने से मना किया तब गडकरी का नाम आया। यानी गडकरी दूसरे दर्जे के नेता हैं जो, आज की बीजेपी के पहले दर्जे के नेताओं की छोड़ी सीट पर बैठ रहे हैं। गडकरी की सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली दरबार के नेताओं से तालमेल बिठाते हुए इसी पहले दर्जे में खुद को स्थापित करने की होगी।
ठीक पहले के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कार्यकाल से भी नितिन गडकरी सबक ले सकते हैं। राजनाथ सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश से आते हैं। और, अध्यक्ष बनते समय यही राजनाथ सिंह के मजबूत पक्ष को दिखा रहा था। लेकिन, कार्यकाल खत्म होते-होते साफ हो गया कि राजनाथ के समय में बीजेपी की देश में जो दुर्गति हुई सो हुई- उत्तर प्रदेश में पार्टी पहले-दूसरे की लड़ाई से नीचे उतरकर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। अब गडकरी के सामने दो राज्यों में भाजपा का प्रभाव फिर से स्थापित करना तुरंत की चुनौती होगी। पहला उत्तर प्रदेश और दूसरा अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में।
उत्तर प्रदेश में नया नेतृत्व तलाशना गडकरी के लिए सबसे मुश्किल काम होगा। बीजेपी में अब तक कद्दावर रहे नेताओं की लाइन एक दूसरे की इतनी छीछालेदर कर चुकी है कि वो, चाहकर भी किसी एक के साथ चल नहीं पाएंगे। ऐसे में गडकरी को कोई ऐसा नेतृत्व खोजना होगा जिसे संघ का आशीर्वाद मिले और जो, नौजवानों की टीम खड़ी कर सके। उत्तर प्रदेश में भाजपा के संगठन मंत्री नागेंद्र नाथ गडकरी के लिए बेहतर दांव साबित हो सकते हैं। नागेंद्र नाथ संघ के प्रचारक हैं। उनके समय में ही विद्यार्थी परिषद राज्य के हर विश्वविद्यालय में प्रभावी स्थिति में पहुंची। और, परिषद-कैडर के प्रत्याशियों को पिछले विधानसभा चुनाव में आजमाने की उन्होंने काफी कोशिश पिछले विधानसभा चुनाव में की भी थी। लेकिन, बसपा की सोशल इंजीनियरिंग और भाजपा के नेताओं की आपसी मारामारी में अपेक्षित परिणाम नहीं निकल सका।
उत्तर प्रदेश से भी बड़ी चुनौती गडकरी के लिए महाराष्ट्र में होगी। क्योंकि, महाराष्ट्र में जाकर भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी को शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टी के पीछे चलना पड़ता है। यही वजह है कि मुंबई हमले और उत्तर भारतीयों पर राज ठाकरे के हमले के बावजूद भाजपा के कमल पर कांग्रेस का हाथ भारी पड़ गया। अच्छी बात ये है कि महाराष्ट्री की राजनीति को नजदीक से देखने वाले खूब जानते हैं कि गडकरी हमेशा महाजन-ठाकरे गठजोड़ के खिलाफ खड़े होकर मजबूत होते रहे। अब गडकरी को राज्य में गोपीनाथ मुंडे और विनोद तावड़े से संतुलन साधना होगा। और, साथ ही संकीर्ण ठाकरे छाया से भाजपा को मुक्त कराना होगा। गडकरी मराठी हैं और इसलिए कुछ समय पहले तक सिर्फ उत्तर भारत की मानी जाने वाली पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर महाराष्ट्र में मराठी-उत्तर भारतीय वोटबैंक को बेहतर तरीके से साध सकते हैं। 
भाजपा शासित राज्यों में सत्ता-संगठन तालमेल के लिए गडकरी को नए सिरे से योजना बनानी होगी। कर्नाटक में येदियुरप्पा का हाथ मजबूत करना होगा जिससे फिर कभी रेड्डी भाइयों की ब्लैकमेलिंग के फंदे में भाजपा न फंसे। गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में बेहद मजबूत मुख्यमंत्रियों की सत्ता में भाजपा संगठन खत्म न हो जाए इसकी चिंता भी गडकरी को करनी होगी। उत्तराखंड में कोश्यारी-खंडूरी की कलह अभी खत्म नहीं हुई है तो, राजस्थान में अब तक पार्टी के पास वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं बन सका है।
इन सारी चुनौतियों के अलावा गडकरी के लिए संघ-भाजपा का संतुलन बनाए रखना भी कम बड़ी चुनौती नहीं होगी। वैसे, अभी भाजपा भले ही 116 सांसदों वाली और कई राज्यों में शासन वाली पार्टी हो लेकिन, सच्चाई यही है कि संघ कैडर लगभग भाजपा से दूरी बना चुका है। उसे वापस लाया जा सकता है इसके लिए कैडर को ये दिखना चाहिए कि संघ का कहा भाजपा अभी भी मानती है। ये खुद गडकरी की ताजपोशी से साबित भी हो चुका है। और, अब आने वाला समय ये तय करेगा कि सबसे कम उम्र सर संघचालक और सबसे कम उम्र भाजपा अध्यक्ष इतिहास में किस तरह से नाम दर्ज कराते हैं।

(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

3 Comments

ज्ञानदत्त G.D. Pandey · December 24, 2009 at 10:29 am

राजनाथ तो कसके लोढ़ दिये! उतना कस के लोढ़ने में गडकरी को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। अन्यथा, भाजपा जिस नादिर पर है, वहां से उसे ऊपर ही उठना चाहिये!

Udan Tashtari · December 24, 2009 at 11:49 am

नितिन गडकरी के लिए इतनी सारी चुनौतियाँ हैं कि यह राह नहीं आसान…आराम से कहा जा सकता है. आगे आगे देखिये.

आपका विश्लेषण पसंद आया.

काजल कुमार Kajal Kumar · December 24, 2009 at 5:11 pm

आशा करनी चाहिये कि नए अध्यक्ष महोदय पार्टी में अपनी पहचान बना पाएं

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