अमेरिकन आइडल की नकल पर बने इंडियन आइडल रियलिटी शो के नोएडा ऑडीशन में इंडियन आइडल बनने की चाह रखने वालों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि आयोजकों के सारे इंतजाम धरे के धरे रह गए। अनियंत्रित भावी इंडियन आइडल्स ने जमकर हंगामा किया, भगदड़ में रौंदे गए कई आइडल अस्पताल पहुंच गए। नोएडा की सड़कों पर घंटों के लिए जाम लग गया। अखबार-टीवी चैनलों पर आयोजकों की बदइंतजामी खबर बन गई। भला हुआ कि इस भगदड़ में कोई अनिष्ट नहीं हुआ। लेकिन, क्या सचमुच कहीं-कोई इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है कि इस देश की भगदड़ की असली वजह क्या है। क्यों, हर दूसरे-चौथे देश भगदड़ लेने लगता है और अगर भगदड़ में देश के कुछ लोगों की मौत हो गई तो, थोड़ी बहुत खबर बन जाती है नहीं तो, भगदड़ों के बारे में कोई चर्चा तक नहीं होती। क्या भगदड़ इस देश की नियति बन गई है।


 अभी कुछ दिन ही हुए हैं जब एक और भगदड़ देश की सबसे बड़ी खबर बन गई थी। इस भगदड़ के देश की सबसे बड़ी खबर बनने के पीछे कई वजहें थीं। सबसे पहली कि ये एक स्वघोषित जगतगुरु कपालु महाराज के आश्रम में आयोजित भंडारे के दौरान हुई भगदड़ थी। दूसरी ये कि पहले के कई मंदिरों में मची भगदड़ों की तरह इस भगदड़ में भी कई निर्दोष जानें चली गईं थीं। तीसरी ये कि बाबाओं-साधुओं के इतने कुकर्म मौके से सामने आ रहे थे कि कृपालु महाराज के आश्रम में मची भगदड़ टीआरपी खींचू और पाठक संख्या बढ़ाऊ खबर बन गई। उस पर आश्रम के एक व्यस्थापाक का ये कह देना कि इन 65 मौतों के लिए ईश्वर जिम्मेदार है—खबरों में और मसाला डाल गया। भगवान भरोसे चलते इस देश में एक बार फिर भगवान के मत्थे 65 मौतों का जिम्मा देकर मामला निपटा लिया गया। लेकिन, कौन था इन 65 मौतों का जिम्मेदार—ईश्वर या फिर ईश्वर के तथाकथित प्रतिनिधि कृपालु महाराज।
ईश्वर तो बिल्कुल भी नहीं थे। कृपालु महाराज के यहां भंडारे में आए लोग मरे थे तो, उन पर जवाबदेही तय हो सकती है। लेकिन, क्या कृपालु महाराज जिम्मेदार थे। थोड़ा ध्यान से देखें तो, कैसे जिम्मेदार थे वो, तो कुछ भूखे-पेटों के भोजन का इंतजाम कर रहे थे साथ ही उन्हें कुछ रुपए और बरतन दे रहे थे। और, क्या ये भगदड़-मौत नहीं होती तो, वही कृपालु महाराज इतने परिवारों के लिए असली जगतगुरु नहीं प्रतिस्थापित हो जाते। तब तो, ये चर्चा टीवी-अखबारों में नहीं होती फिर भी, 25000 गरीबों के भगवान कृपालु ही बन जाते। और, अगले भंडारे में 50000 गरीब इस कृपालु भगवान के दरवाजे खड़े होते।

दरअसल इन भगदड़ मौतों के असली जिम्मेदार खोजकर उसके सही इलाज के बजाए सारी मशक्कत किसी कृपालु, किसी इंडियन आइडल के आयोजक को गुनहगार बताकर असली समस्या पर ध्यान न जाए इसकी कोशिश सफलता पूर्वक काम कर रही है। ये गुनहगार हैं तो, मुंबई पुलिस की भर्ती के दौरान हुई भगदड़ में मारे-रौंदे गए लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन है। लगभग हर बार सेना की भर्ती में सेना के जवान बनने के बजाए सेना के जवानों की गोली खाने के लिए अभिशप्त बेरोजगारों की मौतों-भगदड़ों का जिम्मेदार कौन है।
असली जिम्मेदारी किसकी है ये सबको पता है लेकिन, अगर असली जिम्मेदार खोज लिया गया तो, मुश्किल बढ़ जाएगी। अब ये तर्क आ सकता है कि इन सारी भगदड़ों-मौतों की जिम्मेदारी एक जगह जाकर कैसे तय हो सकती है। नोएडा, प्रतापगढ़ का कृपालु महाराज का आश्रम, मुंबई या फिर देश के दूसरे हिस्सों में सेना की भर्ती या फिर रोजगार का कोई दूसरा मेला। चलिए शुरुआत प्रतापगढ़ के कृपालु महाराज के आश्रम से करते हैं। यहां भगदड़ की वजह ये बनी कि एक टाइम का खाना मुफ्त में खाने के लिए कुछ हजार लोग पंगत में बैठ चुके थे। और, बाहर उससे कई गुना लोग एक टाइम के भोजन और थाली-लोटा के साथ 20 रुपए मिलने की आस में खड़े थे। ज्यादा समय लगने लगा तो, भूख जोर मारने लगी और 20 रुपए, थाली-लोटा न मिल पाने का अनजाना डर उन पर हावी होने लगा और उन्होंने गेट तोड़ दिया। कुछ लोगों के ही ऊपर गेट गिरा लेकिन, उससे मची भगदड़ ने 65 जानें ले लीं। जाने कितने लोगों का सामान्य जीवन शुरू होने में महीनों लग जाएंगे।

दरअसल यही भूख और बेकारी असली वजह वजह है इस देश की भगदड़-मौतों की। ये भगदड़ उसी बीस रुपए की वजह से है जिस पर अभी भी देश की बड़ी आबादी का रोजाना गुजर-बसर हो रहा है। ये हमारी पैदा की हुई विसंगति की भगदड़ है जहां दुनिया की मंदी में भी हम इंडिया ग्रोथ स्टोरी के सिर्फ थोड़ा धीमा पड़ने की बात करते हैं लेकिन, उन लोगों की चिंता बस इतने से पूरी हो जाती है कि साल के 365 दिन में से कम से कम 100 दिन का रोजगार हम देने वाली योजना ले आ रहे हैं। ये अलग बात है कि अलग-अलग राज्यों में 100 दिन के दावे का भी 18 से 60 प्रतिशत ही पूरा हो पा रहा है।
ये भगदड़ तरसते भारत के चमकते इंडिया के साथ की चाह में मची है। भूख-बेकारी के दौर में सेना या पुलिस की नौकरी के लिए लगी लाइन कोई देश सेवा की चाह में नहीं है। ये सिर्फ अपना और अपने परिवार का पेट भरने-जीवन स्तर बेहतर करने की चाह में लगी लाइन है। उस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसा समझदार अर्थशास्त्री कह रहा है कि हमने महंगाई बढ़ने दी, बेरोजगारी नहीं। पिछले साल भर में टेक्सटाइल, आईटी, रिटेल, रियल इस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग हर चमकते क्षेत्र से निकाले गए लोगों की बेरोजगारी की खबरों से ही टीवी-अखबार भरे रहते थे। इन सेक्टरों को जिंदा रखने के लिए रियायतों का पिटारा खोलने से उद्योगपतियों ने तो अपना मुनाफा बचा लिया लेकिन, जिनके पेट पर लात पड़ी उन्हें कहीं से मरहम नहीं मिला। फिर भी प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि हमने महंगाई भले बढ़ने दी लेकिन, बेरोजगारी पर काबू पाया।

ये देखने में भले लगता है कि इंडियन आइडल बनने की लाइन में खड़ा हर लड़का-लड़की ये चमक-दमक के लिए बनना चाहता है। सच्चाई ये होती है कि वो, जल्दी से पैसा कमाकर भारतीय से हटकर इंडियन बन जाना चाहता है। इस चक्कर में भगदड़ का शिकार भी बनता है। लेकिन, इस सिस्टम में जब तक भगदड़ों-मौतों के लिए किसी कृपालु महाराज, इंडियन आइडल के आयोजक या फिर सेना-पुलिस की भर्ती में पुख्ता इंतजाम न होने को बहाना बनाकर जिम्मेदारी थोपी जाती रहेगी। तब तक देश की भगदड़ मौतें रोकने का शायद ही कोई इंतजाम हो पाए। इसीलिए भगदड़ और भगदड़ में हुई मौतें इस देश की नियति बनती जा रही हैं। और, देश असली समस्या से ही भगदड़ लेता दिख रहा है।

(ये लेख राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है)

5 Comments

Sanjay Kareer · March 11, 2010 at 12:59 pm

असली जिम्मेदारी किसकी है ये सबको पता है लेकिन, अगर असली जिम्मेदार खोज लिया गया तो, मुश्किल बढ़ जाएगी।

…… आपकी इसी बात में तो पूरा सार छिपा है।

महेन्द्र मिश्र · March 11, 2010 at 1:55 pm

सबसे पहली जबाबदारी आयोजको की बनती है … की वे सुद्रढ़ व्यवस्था करें

S B Tamare · March 11, 2010 at 2:24 pm

जनाब त्रिपाठी जी !
आपने तो चोर का हाँथ पकड़कर उसे उसकी अम्मा के घर तक पंहुचा दिया है /
ये बिलकुल सही बात है कि ये मुल्क के सियासतदा मुठ्ठी भर शातिर लोग इतने बाज लोग है कि मुद्दे को अपनी आला कलाकारी के जोर पर नुमाया ही नहीं होने देते और भोली भाली जनता गुमराह हुयी तक़दीर के फूटी होने का खामख्याल पाले रखती है / आगे तो वक्त ही बतावे गा कि हम कब तक इन बेमुरौत हुक्मरानों के हांथो ठगे जाते रहेंगे /
पुनश्च, बेहतर लेख के लिए आप की तहे दिल से सराहना करता हूँ /
शुक्रिया, उम्मीद है आगे भी आप टिप्पणियों के लिए अवसर देते रहेंगे , थैंक्स.

मनोज कुमार · March 11, 2010 at 3:41 pm

विचारोत्तेजक!

zeal · March 16, 2010 at 2:10 pm

Population explosion is the cause. Cut throat competition among desperate and ambitious younger lot is taking its toll.

Indeed Pathetic !

Comments are closed.