सेना का इस्तेमाल करें या न करें। केंद्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई इस कदर भ्रम में है कि इसी साल के शुरुआती 5 महीने में ही सैकड़ों लोगों की जान जाने के बाद भी वो फैसला नहीं ले पा रही है। आखिर सरकार ये फैसला लेने में इतना संकोच क्यों कर रही है। सेना का इस्तेमाल वहीं किया जाता है जहां देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा पैदा होता दिखे। फिर वो चाहे पड़ोसी मुल्क से हमला हो या फिर बाहर-भीतर से देश में दहशत फैलाने वाले आतंकवादियों का हमला हो। अब अगर नक्सलियों के मामले में देखें तो, वो ठीक उसी तरह इस देश की राज्य व्यवस्था को मानने को तैयार नहीं हैं जैसे, आतंकवादी। ये नक्सली अपने खिलाफ खड़े हर हिंदुस्तानी की जान आसानी से ले रहे हैं जैसे आतंकवादी- फिर सेना के इस्तेमाल में इतना संकोच क्यों। आखिर अर्धसैनिक बलों की पूरी ताकत झोंककर नक्सलियों के सफाए की ही कोशिश तो सरकार कर रही है। फिर ये कोशिश आधे मन से क्यों। 
ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस में सैकड़ो निर्दोष जानें जाने के पहले जब दंतेवाडा़ से सुकमा जा रही बस को निशाना बनाया था तो, नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों ने नया राग शुरू कर दिया था कि कि पहली बार नक्सलियों ने आम लोगों की जान ली है। नक्सल आंदोलन की प्रबल पैरोकार अरुंधती रॉय कह रही हैं कि अगर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रही बस में सचमुच पुलिस अधिकारियों के साथ आम लोगों की भी जान गई है तो, इसे किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। वैसे एक और विरोधी तर्क लगे हाथ ये भी पुरजोर तरीके से चलाने की कोशिश हो रही है कि पुलिस ने आम लोगों के लिए इस्तेमाल में आने वाली बस में जाने की कोशिश करके गुनाह किया है। नक्सल हत्यारों के समर्थक ये भी कह रहे हैं कि युद्ध क्षेत्र मेंCRPF को नक्सलियों के सफाए के लिए सामान्य बसों में जाना ही गलत है।
प्रचारित किए जा रहे इन दोनों ही तथ्यों को ठीक से समझने की जरूरत है। पहला ये कि नक्सलियों ने पहली बार पुलिस, अर्धसैनिक बलों के अलावा आम लोगों की हत्या की हैं। और, दूसरा युद्ध क्षेत्र में अर्धसैनिक बलों का आम लोगों की सवारी का इस्तेमाल करना युद्ध के नियमों के खिलाफ है। सबसे पहले तो यही कि पहली बार नक्सलियों ने आम लोगों की हत्या की ये पूरी तरह गलत है। सच्चाई ये है कि देश भर में पिछले 10 सालों में नक्सलियों ने करीब 6000 जानें ली हैं। जिनमें सिर्फ छत्तीसगढ़ के बस्तर में ही 1000 से ज्यादा आम लोगों की जानें गई हैं। पुलिस के साथ बस में मारे गए आम लोगों की जान जाना सुर्खियों में आया लेकिन, ज्यादातर नक्सलियों के फरमान न मानने पर जन अदालत के हुक्म पर आदिवासियों-स्थानीय निवासियों की जान जाने की खबर कभी सुर्खियां नहीं बन पातीं।
रॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर में लगभग 20 हजार नक्सली सक्रिय हैं। देश के 604 में से 160 जिलों के कई हिस्सों में आतंक के बूते इनकी समानांतर सरकार चलती है। ज्यादातर इनका असर उन इलाकों में है जहां खनिज संपदा भरपूर है जो, पूरी तरह से अपने राज्यों के बाहरी हिस्सों में हैं। जहां आवागमन, संचार के साधन ना के बराबर हैं और जो, बने उन्हें इन्होंने ध्वस्त कर दिया। छत्तीसगढ़ का बस्तर, आंध्र प्रदेश का करीमनगर, महाराष्ट्र का गढ़चिरौली और उड़ीसा का मलकानगिरि- ये ऐसे इलाके हैं जो, अपने राज्यों की राजधानियों से दूर और सीमावर्ती राज्यों से सटे हैं। इस पूरे क्षेत्र के दंडकारण्य जंगलों में पूरी तरह से नक्सलियों का राज चलता है। नेपाल और चीन के माओवादियों का समर्थन इन्हें ताकत देता है। 1967 में पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन आज सत्ता पर कब्जे के लिए कुछ अतिमहत्वाकांक्षी, भ्रमित अतिवामपंथी लोगों की निजी लड़ाई जैसा बनकर रह गया है।
माओवादी, नक्सली समर्थक बुद्धिजीवियों का इसे विकास चाहने वालों की लड़ाई बताना भी कुतर्क से ज्यादा कुछ नहीं है। थोड़ी सी बुद्धि लगाने पर ही माओवाद-नक्सववाद समर्थक बुद्धिजीवियों के इन तर्कों की पोल खुलने लगती है कि ये विकास का अपना हिस्सा मांगने वालों की लड़ाई है। ये सही है कि आदिवासी और पिछड़े इलाकों में विकास का काम बेहद कम हुआ है और यही वजह है कि नक्सलियों को वहां अपनी जमीन मजबूत करने का मौका मिल गया। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि एक बार कब्जा जमा लेने के बाद नक्सलियों ने बची-खुची सड़कों, बिजली, स्कूल, पुल और दूसरी सुविधाओं को भी ध्वस्त करना शुरू कर दिया। छत्तीसगढ़ में अपने कब्जे वाले इलाके में नक्सलियों ने 100 से ज्यादा स्कूलों, करीब 150 बिजली के खंभों और करीब 100 इलाके को जोड़ने वाली सड़कों को धवस्त कर दिया।
बार-बार आदिवासियों की जमीन छिनने की बात की जाती है। लेकिन, क्या इतने सालों से नक्सलियों के समांतर शासन में आदिवासियों का कुछ भी भला हो पाया है। क्योंकि, वो बेचारे तो दोनों ही तरफ से मारे जा रहे हैं। नक्सलियों के साथ हथियार न उठाओ तो, नक्सली मारें और मुठभेड़ में पुलिस मारे। तरक्की, अच्छी जिंदगी की चाह में सलवा जुडूम में शामिल होकर सरकार के साथ आओ तो, भी नक्सलियों के शिकार बनो। वैसे, नक्सलियों के दमन से सबसे ज्यादा प्रभावित छत्तीसगढ़ में सरकार ने अब तक दो लाख से ज्यादा आदिवासियों-स्थानीय निवासियों को जमीन के पट्टे दिए हैं।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम दोनों ही इस बात पर अब एकमत हैं कि नक्सली, आतंकवादी हैं। रमन सिंह तो विचारधारा के लिहाज से भी अतिवादी वामपंथी नक्सलियों के विरोधी हैं लेकिन, गृह मंत्री चिदंबरम की कांग्रेस उन्हें शायद एकदम से कड़े फैसले लेने की इजाजत नहीं देती। शायद इसीलिए दिग्विजय सिंह ये जोर शोर से कहते रहते हैं कि नक्सलियों को आतंकवादी नहीं माना जा सकता। अब अगर कोई ये कहता है कि राज्य सत्ता नक्सलियों को आतंकवादी बनाकर उनका सफाया करना चाहती है तो, इसमें गलत क्या है। क्योंकि, लोकतंत्र के सारे नियमों को ध्वस्त करके सिर्फ बंदूक की गोली से क्रांति की उम्मीद रखने वाले इन भटके लोगों को सुधारने का और देश के भीतर के इस सबसे बड़े डर को दूर रखने का शायद अब कोई रास्ता ही नहीं बचा है।
और, सबसे कमाल की बात तो ये कि जंगलों में गोली खाते-मारते घूम रहे इन नक्सलियों के दिमाग खराब करने वाले बुद्धिजीवियों की जमात दिल्ली से लेकर विदेशों तक बैठकर सिर्फ बतकही से काम चला ले रही है। वो, दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर और JNU जैसी जगहों पर चर्चा और जंतर-मंतर पर कुछ रस्मी धरना प्रदर्शन से ही अपना काम चला ले रही है। खुद महानगरों के संपूर्ण सुविधायुक्त जगहों पर रहकर मरने-मारने पर उतारू नक्सलियों के पक्ष में सिर्फ बयान देकर बड़े-बड़े अवॉर्ड जुहाती रहती है। और, इन अवॉर्ड्स की चमक भी न देख पाने वाले कुछ और नौजवानों को भटकाकर खून की होली खेलने के लिए तैयार कर देती है।

दूसरी प्रचारित की जा रही बात कि युद्ध क्षेत्र में सामान्य बसों से अर्धसैनिक बसों का जाना युद्ध के नियमों के खिलाफ है। ये बात साफ करती है कि ये देश के खिलाफ जंग है और जंग में सब जायज है। भले ही ये अपने ही कुछ लोग हैं जो भटक गए हैं लेकिन, ये साफ है नक्सलवाद अब सिर्फ विचारों की लड़ाई नहीं रह गई है। ये बंदूक की लड़ाई है और सिर्फ बंदूक की लड़ाई से ही इससे निपटा जा सकता है। आतंक की सारी हदें पार कर चुके इन लोगों से निपटने के लिए सरकार को अब आतंकवादियों से लड़ने जैसे असाधारण तरीके ही अपनाने होंगे। क्योंकि, इस लड़ाई के खत्म होने में जितनी देर होगी। अपने ही देश के लोग उतना ज्यादा इस लड़ाई के हवन में स्वाहा होते जाएंगे। फिर चाहे वो, अर्धसैनिक बलों के जवान हों, आदिवासी या फिर भटके हुए नक्सली। 

(this article is published on rashtriya sahara and peoples samachar’s edit page)

6 Comments

डॉ. मनोज मिश्र · May 19, 2010 at 3:09 pm

सही कह रहे हैं,सहमत.

अभिषेक सत्य व्रतम · May 19, 2010 at 4:06 pm

सर, सही कहा है आपने.. नक्सलवाद अब कहीं से भी विचारों की लड़ाई नहीं रह गई है। अगर सिर्फ विचारों,हक और सही मुद्दों की लड़ाई होती तो शायद अब तक नक्सिलियों के आकाओं को ये बात समझ में अच्छी तरह से आ गई होती कि बातचीत के जरिए ही इसका हल मुमकिन है। लेकिन न तो वो बात करने को तैयार हैं और न ही कभी तैयार होंगे। सच ये है कि कुछ मुट्ठी भर लोग ही हजारों नक्सलियों के कंचों पर बंदूक रखकर चला रहे हैं। लेकिन विकृत हो चुके दिमागों को कहीं से भी मासूम करार नहीं दिया जा सकता अगर उनकी हरकतें वहीं है जो कि आतंक फैलाने वाला एक शख्स करता है। इस समस्या का हल यही है कि सरकार उन्हें बेगुनाहों का खून बहाने वालों का गुनहगार माने और उनके साथ वही सलूक करे जो कि एक आतंकवादी के साथ किया जाना चाहिए। शायद आखिरी रास्ता यही होगा..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन · May 20, 2010 at 12:54 am

बहुत अच्छा आलेख है, बधाई! झंडा या नाम बदल लेने से आतंकवादियों के कुकर्म नहीं बदलते हैं. निर्दोष नागरिकों की रक्षा और विकास किसी भी प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए.

Mithilesh dubey · May 20, 2010 at 4:04 am

सही कहा आपने , अब यही मसय उचित है , कहीं ऐसा ना होकि देर हो जाये ।

Sanjay Sharma · May 20, 2010 at 7:51 am

घोर सहमति तो है लेकिन हर चैनल पर बैठा नक्सल की
बोली को भी दबाने में नाकाम सरकार गोली कैसे वर्षाएगी

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey · May 21, 2010 at 3:55 pm

कितने ही सुविधाभोगी हिन्दी ब्लॉगर नक्सल के पक्ष में टर्राते रहते हैं। उनके ब्लॉग पर सब साधुवादी टिपेरते हैं बार्टर में।

🙂

Comments are closed.

Related Posts

राजनीति

ममता की मुस्लिम राजनीति से मुसलमानों का कितना भला

ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की जनता लगातार जनादेश दे रही है। लोकतंत्र में सबसे ज्यादा महत्व भी इसी बात का है। लेकिन, जनादेश पाने के बाद सत्ता चलाने वाले नेता का व्यवहार भी लोकतंत्र Read more…

राजनीति

बुद्धिजीवी कौन है?

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के बुद्धिजीवियों को भाजपा विरोधी बताने के बाद ये सवाल चर्चा में आ गया है कि क्या बुद्धिजीवी एक खास विचार के ही हैं। मेरी नजर में बुद्धिजीवी की बड़ी सीधी Read more…

राजनीति

स्वतंत्र पत्रकारों के लिए जगह कहां बची है?

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बुद्धिजीवियों पर ये आरोप लगाकर नई बहस छेड़ दी है कि बुद्धिजीवी बीजेपी के खिलाफ हैं। मेरा मानना है कि दरअसल लम्बे समय से पत्रकार और बुद्धिजीवी होने के खांचे Read more…