फिल्म में बंगालन के चक्कर में बचपना करते मनोज
देख ली। चरित्र भी सॉलिड टाइप के हैं। हर चरित्र का दादागीरी अच्छी दिखी। लेकिन, बड़ी ही असफल कोशिश दिखी- गुंडई और आतंक का अतिरेक दिखाने की। गैंग्स ऑफ वॉसेपुर में फर्जी गैंगबाजी। फर्जी गोली-बम, कसाईबाड़ा। मांस के लोथड़े और, मोहल्ले स्तर की गालियां- उसमें भी कोई कलाकारी नहीं। इसीलिए A प्रमाणुपत्र भी मिल गया। अब बताइए विक्रम भट्ट-महेश भट्ट सेक्स, आतंक बेचें तो, बाजारू (कमर्शियल) फिल्म कहकर आलोचना हो। और, जब अनुराग कश्यप टाइप कोई थियेटर वाले अंदाज में वही सेक्स, आतंक बेचें तो, कला (आर्ट) फिल्म। पूरी फिल्म में ताना बाना, बुनावट काफी कमजोर दिखी। माफ कीजिए बेवजह तारीफ कर पाना आदत में ही नहीं है। #GOW #Anuragkashyap #hindicinema

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