आर्थिक विकास पर प्रधानमंत्री के भाषण के समय विरोध प्रदर्शन
संतरी लूटे तो, जाए जेल-प्रधानमंत्री लूटे तो, कानून फेल
 
ये लिखा है प्रधानमंत्री के खिलाफ शर्ट उतारकर विरोध प्रदर्शन करने वाले वकील संतोष कुमार सुमन के फेसबुक प्रोफाइल पर।
 
( इस विरोध प्रदर्शन के तुरंत बाद ये लाइनें लिखी हैं। दिल से निकली हैं इसलिए इसे लिखने भर का समय लगा। दिमाग नहीं लगाना पड़ा)
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों इराकियों के मरने पर भी इराकी कुछ कर नहीं पाते हैं
 
तो, दुनिया के सर्वशक्तिमान अमेरिका के राष्ट्रपति पर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब हजारों सिखों की जान की कीमत किसी नेता की मौत के बदले में जायज हो जाती है
 
जब सालों के बाद भी देश की न्याय प्रक्रिया गुनहगारों को खुला छोड़े रहती है
तो, एक सिख को गृहमंत्री से डर लगना बंद हो जाता है
 
फिर जूता चल जाता है
 
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब सरकारी प्रवक्ता कुछ भी बोलकर चला जाता है
 
जब उसकी बात को जायज ठहराना ही नियति बनने लगती है
 
तो, फिर जूता चल जाता है
 
 
बात जब हद से गुजर जाती है
 
जब किसी बात पर मन का गुस्सा तिलमिलाहट में बदल जाता है
 
जब हमको लगता है कि हमारी बात सत्ता सुनेगी नहीं
 
जब देश के प्रधानमंत्री बताने लगते हैं कि पेड़ों पर पैसे नहीं उगते
 
जब प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार, महंगाई को जायज ठहराने लगते हैं
जब प्रधानमंत्री देश की हर समस्या का इलाज विदेशी नुस्खे से करने को जायज ठहराने लगते हैं
जब न बोलने वाले प्रधानमंत्री ऐसा बोलते हैं कि आम आदमी जख्म पर मिर्ची जैसा लगता है
तो, जूता नहीं चलता, आम आदमी नंगा हो जाता है
देश का हाल तो, प्रधानमंत्री जानें, बता ही चुके हैं कि सोना गिरनी रखने की नौबत आ चुकी है
लेकिन, अगर ऐसे ही देश सुधारते रहे
तो, आम आदमी के तन बदन पर कपड़ा भी नहीं बचने वाला
लोकतंत्र में क्या आम आदमी अपना असल हाल भी देश के मुखिया के सामने बता नहीं सकता
फिर बताइए विरोध का और तरीका क्या होगा

6 Comments

अंशुमान सिंह · September 22, 2012 at 7:31 am

हर्ष जी, जनता का दर्द ऐसे ही सामने आता है—-आवाज भले ही कोई दे।

काजल कुमार Kajal Kumar · September 22, 2012 at 2:08 pm

आम दु:खी आदमी और करे भी तो क्‍या करे

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · September 22, 2012 at 7:09 pm

विज्ञान भवन में दुनिया भर से आये बड़े लोगों के बीच मनमोहन की पोल खोलने का काम वाकई काबिलेतारीफ़ है। शाबास।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · September 23, 2012 at 2:18 pm

कल का मेरा कमेन्ट कहाँ गया?

मनमोहन सिंह की वर्षों से कमाई हुई सारी ईमानदार छवि अब निष्क्रिय, निष्प्रभावी और जी-हुजूरी करने वाले में तब्दील हो चुकी है। माफिया के आगे घुटने टेकने को मजबूर एक हारे हुए लोकसेवक की तरह व्यवहार कर रहे हैं हमारे प्रधान मंत्री जी।

आशा जोगळेकर · September 25, 2012 at 12:10 am

!!!!!!

indianrj · January 22, 2013 at 5:23 am

एकदम सच! दूसरों के लिए अपने व्यक्तिगत योगदान से संतुष्ट, लेकिन व्यवस्था से तंग आ चुका एक आम आदमी जूता चलाये, या जूता चलाने वाले का समर्थन करे, ये जूता खाने जैसी हरकतें करनेवाले नेताओं को समझना चाहिए, वरना अगला नंबर शायद……
बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति।

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