रिपब्लिकन वेबसाइट पर ओबामा की हेल्थकेयर योजना का विरोध
अमेरिका बंद है। चौंकाने वाली बात है कि ये कैसे हो सकता है। दुनिया जिस एक देश के इशारे
पर चलती है। जिस एक देश के बारे में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ये सोचते हैं कि उसके
मुखिया से शिकायत लगाकर भारतीय प्रधानमंत्री अपने पक्ष की बात मजबूत कर लेंगे। जिस
एक देश की अपनी समस्याएं भले खत्म न हों लेकिन, कश्मीर सुलझाने के लिए वो आगे आ
जाता है। जिस देश के बैंकिंग सिस्टम के दिवालियेपन से दुनिया एक बार बर्बाद हो
चुकी है बड़ी मुश्किल से पटरी पर आ रही है। जिस अमेरिका के सुधरने से भारत जैसा
देश भी अपनी अर्थव्यवस्था सुधरने का अनुमान लगाए बैठा है। उस अमेरिका में ताला
कैसे लग सकता है। लेकिन, सच्चाई यही है कि वहां ताला लग गया है। अमेरिका को ताला
कैसे लग सकता है। दरअसल अमेरिका के 8 लाख फेडरल कर्मचारी (भारतीय संदर्भ में समझें
तो केंद्रीय सरकार के कर्मचारी) छुट्टी पर भेज दिए गए हैं। और कम से कम एक अक्टूबर
यानी आज की तनख्वाह तो नहीं पाने वाले। अब आज रात किसी तरह अमेरिका की इज्जत बचाने
के लिए कोई समझौता रिपब्लिकन और डेमोक्रैट के बीच हो जाए तो बात अलग।
वैसे
तो अमेरिका जिस राह पर था उसका इस हाल में पहुंचना तय था। अमेरिकी भी काफी समय से ये मानने लगे हैं कि अमेरिका गलत रास्ते पर है। लेकिन, अभी जो अमेरिकी
बंदी की वजह बनी है वो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की निजी इच्छा है। निजी
इच्छा मतलब ओबामा ने 2010 में एक हेल्थकेयर कार्यक्रम लागू किया था जिसे एक
अक्टूबर यानी आज के दिन से लागू होना था। सारी लड़ाई उसी की है। इसके लिए फंड का
भी प्रावधान कर दिया है वहां की सीनेट (संसद) ने। ये उसी तरह से समझिए कि जैसे
सोनिया गांधी के निजी सुरक्षा बिल को आनन फानन में पहले अध्यादेश और फिर कानून
बनाकर संसद से पास कर दिया गया। चालू खाते का घाटा पहले तिमाही यानी अप्रैल से जून
के दौरान 4.9% का पार कर गया है। लेकिन, सोनिया गांधी की
निजी इच्छा वाली खाद्य सुरक्षा योजना लागू हो गई है। हालांकि, वो धीरे-धीरे लागू
होगी। चुनावी राज्यों यानी दिल्ली से इसकी शुरुआत हुई है और 2014 के चुनाव जीतने
भर की वोट सुरक्षा योजना बन गई है। ठीक इसी तरह बराक ओबामा ने अमेरिकियों के लिए
हेल्थकेयर योजना शुरू की है। अब अमेरिका पहले ही कर्ज के बोझ में बुरी तरह डूबा
हुआ है। उस पर ये हेल्थकेयर योजना का खर्च मुसीबत बन गया है। इससे पहले भी कर्ज की
सीमा बढ़ाने को लेकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था खतरनाक संकट से जूझ चुकी है। अमेरिकी
कांग्रेस ने अभी कर्ज लेने की अधिकतम सीमा $16.7 ट्रिलियन तय कर रखी है। अब अगर ये सीमा नहीं बढ़ाई जाती है तो
सरकार खर्च चलाने के लिए भी रकम का जुगाड़ मुश्किल से कर पाएगी। लेकिन, मुसलमानों से लड़ता अमेरिका दुनिया का नेता बना हुआ है। और मुसलमान हैं कि ये समझने को तैयार नहीं। पता नहीं किससे हर रोज हर जगह लड़ रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गड़बड़ी को मौके के तौर पर सिर्फ चीन देख रहा है। उसी तरह से कर भी रहा है। जब अमेरिकी एक अक्टूबर से फेडरल कर्मचारियों की बिना वेतन की छुट्टी से डरे हैं तो उसी एक अक्टूबर से चीन में हफ्ते भर की राष्ट्रीय छुट्टी जैसी शुरू हो रही है। जिसमें चीनी जमकर मस्ती करेंगे, खरीदारी करेंगे और अर्थव्यवस्था छुट्टी में भी बेहतर करेंगे।
इस हालात में भी अमेरिकी दादागीरी चालू है। दुकानदारी चालू
है। अमेरिकी राष्ट्रपति का फोन कर लेना ईरान में खलबली मचा देता है। अमेरिका अभी
भी संयुक्त राष्ट्र संघ के जरिए सब तय करता है। अभी भी अमेरिका का वीजा भारत के
प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करने वाले नरेंद्र मोदी के लिए महत्व रखता है। और अभी
भी अमरिका परस्त होना मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्थिर रखने लायक
बनाता है। और रघुराम राजन अमेरिकी होकर दिखकर अच्छे से रुपये को गिरने से रोक लेते हैं। अमेरिका धड़धड़ाकर गिर रहा है। भारत समझ नहीं पा रहा है कि हम कैसा देश बनें। लेकिन, जिनके जिम्मे समझने का काम यानी सरकार है उसकी चले तो भारत अमेरिका के रास्ते पर चलना चाहता है। अमेरिका बनना चाहता है।
आखिर में रिपब्लिकन को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का ये ट्वीट 
“The Affordable Care Act is moving
forward. You can’t shut it down.” —President Obama #Obamacare

2 Comments

प्रवीण पाण्डेय · October 1, 2013 at 9:37 am

जय हो, जयति जिद्दी।

संतोष पाण्डेय · October 3, 2013 at 4:47 am

लगता है ओबामा भी भारतीय राजनेताओं के पदचिन्हों पर हैं।

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