पूरी
दिल्ली में जबर्दस्त बिजली कटौती है। भारतीय जनता पार्टी को इस पर मामले पर
कार्रवाई करनी चाहिए और जवाब देना चाहिए। अरविंद केजरीवाल का ये ट्वीट शनिवार को
उस समय आया जब लोग ये जानना चाह रहे थे कि आखिर आम आदमी पार्टी बची रहेगी या खत्म
हो जाएगी। क्योंकि, शनिवार को आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दूसरे
दिन योगेंद्र यादव-नवीन जयहिंद विवाद से उपजे मुद्दे पर चर्चा होनी थी। ये वो
मुद्दा था जिसमें योगेंद्र यादव तक ने कह दिया कि अरविंद केजरीवाल का व्यक्तित्व
पूरी पार्टी पर भारी पड़ रहा है। बिजली कटौती के सरोकारी ट्वीट के करीब एक घंटे
बाद अरविंद का दूसरा ट्वीट आया कि योगेंद्र यादव उनके प्यारे दोस्त हैं और उनके
उठाए गए मुद्दों पर बात की जाएगी। फिर लगे हाथ ये भी ट्वीट आ गया कि शाजिया इल्मी
को पार्टी में वापस लाने की पूरी कोशिश होगी। शाजिया इल्मी ने भी जो आरोप लगाकर
पार्टी छोड़ी थी। वो लगभग उसी तरह के थे जैसे आरोप कांग्रेस, बीजेपी पर लगाकर
अरविंद ने आम आदमी पार्टी खड़ी की थी। यानी सुप्रीमो या हाईकमान संस्कृति। और अब
अरविंद के सारे साथी जो चुनावों में सफलता मिलने की आस में अरविंद की तानाशाही
(हाईकमान संस्कृति पढ़ें) झेल रहे थे। जैसे ही चुनावों में सफलता नहीं मिली,
भरभराकर अरविंद केजरीवाल की हाईकमान संस्कृति के खिलाफ आवाज उठाने लगे। लेकिन, जरा
इस बात को ठीक से देखने-समझने की जरूरत है। योगेंद्र यादव, पार्टी में लौट आई
अंजलि दमानिया, शाजिया इल्मी या दूसरे वो सारे नेता जो पार्टी छोड़ रहे हैं या
रहते हुए भी सारी कमियों के लिए अरविंद केजरीवाल को तानाशाह बता रहे हैं। ये वही
नेता हैं जो पहले दूसरे लोगों के इसी बात को लेकर आम आदमी पार्टी छोड़ने पर कहते
थे कि अरविंद में समर्पण है। अरविंद के बराबर कोई काम नहीं कर सकता। और कुमार
विश्वास के चिर परिचित अंदाज में कहें तो अरविंद ही है जो पार्टी को आगे ले जा
सकता है। फिर आखिर क्या गड़बड़ हुई जब सब ये मान रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल ही आम
आदमी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत और जना को जोड़ने वाली चुंबकीय शक्ति हैं तो फिर
क्यों ये सारे के सारे नेता एक के बाद एक अरविंद के ही सिर पर सभी असफलताओं का
ठीकरा फोड़कर खुद महान हो जाना चाहते हैं।

दरअसल
सच्चाई यही है कि आम आदमी पार्टी की अकेली और सबसे बड़ी ताकत सिर्फ और सिर्फ
केजरीवाल ही हैं। और, अरविंद ने जिन लोगों को अपने साथ जोड़ा और अपनी मेहनत से
जनता को जोड़कर पार्टी खड़ी की वो, सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल के ही वश का
था। ध्यान से देखें तो समझ में आ जाएगा। प्रशांत भूषण भले नामी वकील हों, योगेंद्र
यादव भले जाने-माने चुनावी विश्लेषक हों, शाजिया इल्मी भले टीवी की पत्रकार रही
हों, सच्चाई यही है कि ये सारे के सारे लोग इच्छा से भले चाहते रहे हों कि आम आदमी
पार्टी जैसी एक पार्टी बने। लेकिन, इसमें उनके भरोसे से ज्यादा उनको अपने लिए मौके
की तलाश थी। इसीलिए जैसे ही पार्टी अस्तित्व में आई तो किरन बेदी, वीके सिंह जैसे
अरविंद से थोड़ा ज्यादा, कम बड़े कद और खुद में भरोसा रखने वाली शख्सियतें धीरे से
बाहर हो गईं। क्योंकि, वो किसी भी कीमत पर अरविंद केजरावील को अपना नेता नहीं मान
सकते थे। लेकिन, योगेंद्र यादव, शाजिया इल्मी और प्रशांत भूषण जैसे लोगों को पता
है कि सामाजिक आंदोलन, राजनीतिक पार्टी के मामले में उनकी अपनी सीमाएं हैं। इसीलिए
वो मौके की तलाश में अरविंद के पीछे जाकर खड़े हो गए। और अरविंद को लगा कि ये सारे
लोग भ्रष्टाचार और सरकारी तंत्र के खिलाफ खड़े होने वाले साथी हैं। गलती यहीं हो
गई। इसीलिए जब-जब मौके की तलाश में आए लोगों के हाथ से मौका छिनता दिखा तो वो एक-एक
कर टूटने लगे। अब सोचिए ना अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी की असफलता को कैप्टन
गोपीनाथ भी सलीके से साबित करने लगे। ये कहकर कि वो पार्टी के संस्थापक सदस्य हैं।
और वो इस्तीफा दे रहे हैं। ये सब खाए-पिए-अघाए लोग थे। जो, अपने प्रोफेशन में काफी
अच्छा करके अरविंद के कंधे पर चढ़कर राजनीति में भी काफी कुछ पा लेना चाहते हैं। इसमें
मनीष सिसोदिया एक अपवाद हैं जो, अरविंद और उस विचार से जुड़कर लो प्रोफाइल काम कर
रहे हैं। और शायद अरविंद के बाद अकेले विश्वसनीय नेता भी आम आदमी पार्टी में वही
बचे हैं। सचमुच कमाल की बात है। जिस पार्टी का आचार-विचार-व्यवहार सब अरविंद और
उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं की वजह से तय होता था। उस पार्टी की पहचान बने ये चेहरे
अरविंद जितने ही बड़े होने की कोशिश करने लगे। इन चेहरों को ये लगने लगा कि वो भी
अरविंद जितना ही काम करके आए हैं। लेकिन, क्या ये सच है। अरविंद को छोड़कर क्या
किसी ने भी किसी तरह का त्याग, संघर्ष किया है। मंच मजबूत हो और एयरकंडीशंड गाड़ी
से निकलकर अपना चेहरा चमकाना हो तो ये काम साल, डेढ़ साल की समय सीमा तय करके कोई
भी कर सकता है। लेकिन, लोग अब चाहे भले ये कहने लगे हों कि अरविंद केजरीवाल की सब
नौटंकी है। सच्चाई यही थी कि उसी त्याग वाले, आम आदमी से दिखने अरविंद केजरीवाल के
साथ ही देश भ्रष्टाचार के नाम पर उठ खड़ा हुआ था। मुश्किल ये है कि अरविंद
केजरीवाल ने सबको साथ लेने के चक्कर में और कांग्रेस-बीजेपी से अलग दिखने के चक्कर
में हाईकमान संस्कृति खत्म करने की बात कह डाली। 

और शुरुआत में उसे व्यवहार रूप
देने की भी कोशिश की। लेकिन, लोकतंत्र का एक दूसरा बड़ा मजबूत पहलू ये भी है कि ढेर
सारे एक बराबर के नेता एक साथ ज्यादा देर तक नहीं चल सकते। और साथ के लोगों में से
जो ज्यादा काबिल, ज्यादा बड़ा होता जाएगा। उसे खुद भी ये अहसास करना होगा। और
जनता-पार्टी के नेताओं को भी ये अहसास कराना होगा। इसका शानदार उदाहरण नरेंद्र
मोदी हैं। नरेंद्र मोदी ने अपने साथ के नेताओं को ये अहसास कराकर उन्हें अपने पीछे
आने के लिए सलीके से तैयार कर लिया और पुराने कार्यकर्ताओं के साथ नए लोग भी इसी
बूते जोड़ लिए। वो भी इस कदर कि लोग बीजेपी के कार्यकर्ता को भी सिर्फ नरेंद्र
मोदी का कार्यकर्ता मानकर सारे विश्लेषण करने लगे हैं। लेकिन, इस एक रणनीति में
अरविंद ऐसा मात खा गए कि अब आम आदमी पार्टी के भविष्य पर ही सवाल उठने लगे हैं।
हाईकमान संस्कृति खत्म करने के चक्कर में ही अरविंद केजरीवाल ने लोगों से पूछकर और
सीधे टिकट के आवेदन करवाकर उनमें से टिकट देने की बात की तो हर कोई टिकट लेने की
लाइन में था। जाहिर है सबको टिकट मिलना संभव नहीं था। और चुनाव जीतने के लिए कई
पैमाने तय करने ही होते हैं। और इसीलिए आम आदमी पार्टी भी उससे अछूती नहीं रह पाई।
इस चक्कर में अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी की हालत माया मिली न राम वाली हो गई।
टिकट बंटवारे में ढेर सारे धांधली के आरोप लगे। इससे आम आदमी पार्टी की अलग पार्टी
वाली छवि पूरी तरह से टूट गई। और उसके पूरी पार्टी ही टूटती दिख रही है। अच्छी बात
ये है कि अरविंद केजरीवाल ने नए सिरे से पार्टी खड़ी करने का साहस नहीं खोया है। और
इसीलिए ढेर सारे जगजाहिर हो चुके मतभेदों के बावजूद जब शनिवार की राष्ट्रीय
कार्यकारिणी में अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव एक ही गाड़ी में
पहुंचे तो ये अरविंद की पार्टी है, यही संदेश देने की कोशिश थी। इसीलिए अरविंद ने
लगे हाथ शाजिया इल्मी को भी वापस लाने की बात कर दी। और हो सकता है कि जल्दी ही एक
साथ फिर वो ढेर सारे चेहरे जो अरविंद और आम आदमी पार्टी के साथ बड़े नेता बन चुके
हैं, हाथ पकड़े मीडिया के लिए फोटो सेशन करें। प्रतीक के तौर पर ये अच्छा है और
जरूरी भी। लेकिन, ये पार्टी की ताकत नहीं हैं। पार्टी की ताकत वही आम आदमी है जो
बिना किसी को जाने चुपचाप सिस्टम पर झाड़ू लगाने चल पड़ा था। लेकिन, इस बार अरविंद
केजरीवाल को ये करने से पहले ये अच्छे से समझना होगा कि बिना हाईकमान संस्कृति के
कोई पार्टी चल नहीं सकती। हां, ये कुसंस्कृति न बन जाए। इसकी चिंता करनी होगी। भ्रष्टाचार
और दूसरी पार्टियों से अलग अपनी छवि को बचाने, बनाने के लिए नए सिरे से कोशिश करनी
होगी। अब उनकी बातें किस तरह से बेअसर होती हैं इसका अंदाजा इसी से लगता है कि जब
वो दिल्ली में बिजली की जबर्दस्त किल्लत पर ट्वीट करके बीजेपी से जवाब मांगते हैं
तो उस पर नब्बे प्रतिशत लोग जवाब में उन्हीं से सवाल पूछने लगते हैं। उसी सवाल में
ये भी कि बहत्तर घंटे बाद बिजली की सुध क्यों आई। क्या पार्टी की अंदरूनी कलह
निपटाने से फुर्सत मिल गई। अरविंद केजरीवाल को ये अहसास करना, कराना होगा कि वही
पार्टी की सबसे बड़ी ताकत हैं। लेकिन, उन्हें खुद ये समझना होगा कि वही पार्टी की
सबसे कमजोर कड़ी हैं। और इस बार फिर से पार्टी खड़ी करना ज्यादा बड़ी चुनौती इसलिए
भी है कि पिछली बार का दिल्ली का चुनाव जीतकर अरविंद मुख्यमंत्री बन गए लेकिन, इस
बार उन्हें चुनावी जीत की नहीं दिल्ली के लोगों का भरोसा जीतने के लिए चुनाव लड़ना
है। अगर अरविंद ये कर पाए तो आम आदमी पार्टी को लेकर मैं यही कहूंगा कि पिक्चर अभी
बाकी है मेरे दोस्त।