ये मेरे पिताजी की लिखी हिंदी की किताब बिहारी विमर्श है। ये किताब इलाहाबाद विश्वविद्यालय सहित कई विश्वविद्यालयों के स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल थी। मेरी पैदाइश के पहले लिखी ये किताब है। फिर वो बैंक मैनेजर हो गए। न कोई किताब लिखी, न इसी किताबको सहेज सके। शोध पूरा करके भी उसे जमा नहीं किया और डॉक्टर कृष्ण चंद्र त्रिपाठी नहीं हो सके। सेवानिवृत्ति के बाद भी वो बैंक की यूनियनबाजी के ही चक्र में फंसे हुए हैं। राज्यसभा टीवी पर दुष्यंत कुमार को देखते ये बात ध्यान में आई। डॉक्टर तो अब मैं भी नहीं बनता दिख रहा लेकिन ढेर सारी किताबें लिखने और उनकी वजह से पहचान की इच्छा मन में है। जिसे शायद पूरा कर सकूँ।