यात्रा हमेशा सिखाती है। और यात्रा में मिलने वाले नए-नए लोग काफी कुछ नया
सिखाते हैं। अकेले यात्रा करने वाले सबसे ज्यादा जानते सीखते हैं। उसकी वजह ये
होती है कि हर नए से बोलने-बतियाने का अवसर रहता है। सीखने के लिहाज से ट्रेन की
यात्रा सबसे कमाल की होती है। रेलगाड़ी के भीतर-बाहर काफी कुछ सीखने लायक
मिलत-दिखता रहता है। लेकिन, आजकल एक और यात्रा होती है। टैक्सी की यात्रा। और
टैक्सी की यात्रा में सिखाने का काम करता है टैक्सी का ड्राइवर। इस बार सपरिवार हम
शिमला यात्रा पर खुद ही कार चलाकर गए। बढ़िया यात्रा रही। मजा आया। लेकिन, शिमला
पहुंचकर हमने वहां घूमने के लिए एक टैक्स ले ली। वजह ये कि खुद कार चलाते रहे तो,
पहाड़ का प्राकृतिक आनंद ले नहीं पाएंगे।
टैक्सी के साथ टैक्सी ड्राइवर रमेश आए। रमेश शिमला से थोड़ा आगे बिलासपुर का
रहने वाला है। शिमला में टैक्सी चलाते हैं। इसी से आसानी से परिवार चल जाता है।
मैंने पूछा हिमाचल प्रदेश के बाहर टैक्सी लेकर जाते हैं। रमेश बोले समय ही नहीं
है। शिमला, मनाली और उससे ऊपर के पर्यटकों से ही फुर्सत नहीं मिलती। परिवार
बिलासपुर में ही रहता है। खेती भी अच्छी हो जाती है। बात शुरू हुई तो हमारे टैक्सी
ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से आया कि
शहर
तो शहर ही होता है। तो पहाड़ के भी शहर में कुछ तो बेईमानी आ ही गई है। वैसे गांव
एकदम ईमानदार हैं।
चायल से घूमकर लौटते रमेश ने शिमला
का अस्पताल दिखाते बताया कि बिलासपुर में एम्स आ रहा है। मैंने पूछा तो बताया कि
हां
, बेहतर
तो हो ही जाएगा। और ये भी बता दिया कि सबसे बेहतर जगह एम्स के लिए बिलासपुर ही है।
जाहिर है बड़ा संस्थान आता है तो वहां के लोगों के लिए अच्छी खबर लेकर आता है।
रमेश ने कहाकि जे पी नड्डा भी हमारे यहां का है। स्वास्थ्य
मंत्री है। हिमाचल में भाजपा का नेता अब वही बनेगा।
हमारे देश में कोई भी राजनीति पर बराबर दखल रखता है। उस दखल
के सिद्धांत को कायम रखते हुए ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से आया कि
मोदी
की लहर में जाने कितने मुर्दे तर गए
। रमेश ने कहाकि इस बार धूमल का लड़का जीतने वाला बिल्कुल
नहीं था। हालांकि, रमेश ने ये भी भविष्यवाणी कर दी कि अगली सरकार फिर से बीजेपी की
होगी। वजह बड़ी ये बताई कि राजा वीरभद्र सिंह की विरासत संभालने वाला कोई नहीं है।

ये सब सामान्य ज्ञान तो रमेश ने बढ़ाया ही। लेकिन, असल
ज्ञान आया, चायल से लौटते कुफरी में घुड़सवारी का आनंद (आनंद कहने की बात है। कभी-कभी ऐसे ही पहाड़ों में जाकर
घोड़ा चढ़ने वालों की जान सांसत में रहती है।) लेने के बाद।
शिमला गेस्ट हाउस लौटते मैंने कहा घोड़ों ने आपस में लड़ते हमारा घुटना तोड़ दिया।
उस पर हमारा घोड़े वाला बेहद बद्तमीज था। खुद को संभालना पड़ा। सामने से दूसरे घोड़े
पर आ रहे परिवार के साथ उनके घोड़े वाले का झगड़ा चल रहा था। क्योंकि, पैर जिस पर
रखते हैं, वो रस्सी टूट गई। पुरुष के साथ उसका बच्चा भी था। वो बुरी तरह से झगड़
रहे थे। पुरुष बोला बच्चा गिर जाता तो। बीच में दखल देते हमारा घोड़े वाला बोला-
बच्चा तुम्हारा है तो तुम्हीं ख्याल रखोगे ना। फिर मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने
अपने घोड़े वाले को डांटा। हालांकि, वो दूसरे के उदाहरण देकर उनको गालियां देता
रहा। मैंने खुद पर नियंत्रण रखा। और बाद में ये घटना ड्राइवर रमेश को बताने पर जो
उसने कहा, उससे खुद के समझदार होने का प्रणाणपत्र प्राप्त होने जैसा अहसास हुआ।
रमेश ने कहा- अरे साहब जो कुछ नहीं कर पाता वही तो इन घोड़ों के साथ दिन भर ऊपर
नीचे दौड़ता रहता है। वरना सोचिए कौन घोड़ों के साथ-साथ ऐसे दौड़ सकता है। फिर
घोड़ों के साथ रहते इनका दिमाग भी घोड़े जैसा हो जाता है। अब बताइए घोड़े से कोई बहस
की जा सकती है। झगड़ा जा सकता है।
इतनी आसानी से ये बात रमेश कह गया। मुझे लगा
सही बात है इस तरीके से कौन पर्यटक सोचता होगा। अगली बार अगर किसी घोड़े वाले से
या किसी और से झगड़ने की नौबत भी आ जाए तो, ड्राइवर रमेश के श्रीमुख से निकली बात
जरूर ध्यान में रखिएगा। 

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