कांग्रेस
ने नरेंद्र मोदी की सरकार के 180 दिन पूरे होने पर यू टर्न सरकार का खिताब दे दिया
था। ये दरअसल कांग्रेस की आरोप पुस्तिका थी। जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर
25 उन मुद्दों से पलटने की जिक्र किया था। जिसे खुद मोदी ने चुनाव के समय करने का
आश्वासन दिया था। उसके बाद हर उस मुद्दे पर जहां भी मोदी सरकार अपने बनाए-बोले
किसी नियम में संशोधन की तलाश करने लगती। कांग्रेस वहां यू टर्न सरकार का आरोप
उछाल देती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने, काला
धन वापस लाने, भूमि अधिग्रहण बिल और नेट न्यूट्रलिटी उसमें सबसे अहम मुद्दे थे।
जिस पर नरेंद्र मोदी पर यू टर्न लेने का आरोप लगाया गया था। वैसे यू टर्न आधार
कार्ड पर भी इस सरकार ने लिया है। कुछ इसी तरह नीतियों के लिहाज से पाकिस्तान पर
भी सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। सवाल ये है कि आखिर एक ताकतवर राजनेता से
मुख्यमंत्री और फिर प्रचंड बहुमत वाले प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ऐसे यू
टर्न क्यों ले रहे हैं जिससे उनकी और सरकार की छवि कमजोर हो रही है। इसका जवाब खुद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में हुए सवाल-जवाब में दे दिया है।
फेसबुक
मुख्यालय में नरेंद्र मोदी के अपने ही फैसले से पलटने की पीछे की वजह की चर्चा
करने से पहले कुछ ऐसे बड़े यू टर्न फैसलों पर नजर डालते हैं। जिससे मामला समझने
में आसानी हो। पाकिस्तान के साथ विदेश नीति के यू टर्न फैसले की बात करते हैं।
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से उत्साही हिंदुत्व कार्यकर्ताओं को कुछ ऐसी
उम्मीद बन गई थी कि वो पाकिस्तान से कम से कम पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर तो
छीन ही लेंगे। इसीलिए एक ये धारणा बड़ी तेजी से लोगों के दिमाग में घर कर गई कि इस
सरकार ने पाकिस्तान के साथ बातचीत का फैसला करके इस मामले पर यू टर्न ले लिया है। हालांकि,
इस सरकार ने पहली बार कूटनीतिक तरीके से पाकिस्तान को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
दूसरा बड़ा फैसला था भूमि अधिग्रहण कानून को अध्यादेश के तौर पर लागू करने का। इसमें
किसानों की मर्जी पूरी तरह से सरकार की मर्जी या कहें कि दया पर आधारित थी। बाद
में विपक्ष के जोरदार विरोध और किसी भी सूरत में इसके संसद से पास न हो पाने की
स्थिति देखकर सरकार ने यहां भी यू टर्न लिया और अध्यादेश वापस ले लिया। नेट
न्यूट्रलिटी पर भी सरकार ने यू टर्न लिया। लेकिन, बाद में सरकार ने नेट
न्यूट्रलिटी को ही अपना सिद्धांत बताया और जोरशोर से उसके पक्ष में ही नीतियां
बनाने का भरोसा दिया। फिर संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद के मंत्रालय ने नेशनल
इनक्रिप्शन पॉलिसी में जबरदस्त गड़बड़ की। ड्राफ्ट पॉलिसी में सरकार ने सभी प्रकार
के सोशल मीडिया संदेशों को नब्बे दिनों तक संभालकर रखने और उसे मांगने पर सरकार को
देने का कानून बनाने की बात की थी। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका से
प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी सरकार की खाट खड़ी होती दिखी। आखिरकार संचार मंत्री
रविशंकर प्रसाद को प्रेस कांफ्रेंस करके इस बेतुके ड्राफ्ट को वापस लेना पड़ा। इस
यू टर्न से समझ में आता है कि ढेर सारे मुद्दों पर नरेंद्र मोदी की सरकार ने यू
टर्न लेना क्यों ठीक समझा। और इससे ये भी समझ में आता है कि कम से कम ये सरकार
अपने ही किसी फैसले को पलटने में देर नहीं लगाती। अगर उसे ये समझ में आ जाए कि इस
फैसले से जनता उसके खिलाफ हो रही है। नेशनल इनक्रिप्शन पॉलिसी का ड्राफ्ट आया, तो
इतनी जबरदस्त प्रतिक्रिया लोगों की हुई कि चौबीस घंटे के भीतर मंत्री को सामने आना
पड़ा। गलती माननी पड़ी। ड्राफ्ट वापस लेना पड़ा। इसका मतलब ये हुआ कि सरकार का
फीडबैक सिस्टम ठीक काम कर रहा है। वैसे तो साफ तौर पर दिखता यही है कि भूमि
अधिग्रहण कानून इसलिए नहीं बना कि सरकार के पास उसे पास कराने के लिए पर्याप्त
संख्याबल नहीं है। इसीलिए उसे वापस लेना पड़ा। लेकिन, एक दूसरा पहलू ये भी है कि
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया भूमि अधिग्रहण कानून के बहुत पक्ष में नहीं
थी। धीरे-धीरे सरकार की छवि किसान विरोधी होती जा रही थी। इसलिए सरकार को भूमि
अधिग्रहण कानून से पूरी तरह से पीछे हटना पड़ा। दरअसल नरेंद्र मोदी को ये बहुत
अच्छे से पता है कि 2019 में उनको जवाब देना होगा। और उस समय अगर कुछ बदलाव नहीं
दिखा, तो कोई तर्क काम नहीं आएगा। इसीलिए नरेंद्र मोदी ने चीन की तर्ज पर औद्योगिक
तेजी के लिए इस भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने की योजना बनाई थी। जिससे 2019 के
पहले बड़े बदलाव करके जनता के मन में बन रही किसान विरोधी छवि को बेहतर उद्योग,
विकास, रोजगार से भरा जा सके। लेकिन, जब लगा कि घर के रहे न घाट के वाली स्थिति
सरकार की होने जा रही है, तो सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून पर पीछे हटना पड़ा।

आधार पर
भी इस सरकार का यू टर्न साफ दिखता है। लेकिन, सच्चाई यही है कि लोगों में इस योजना
को लेकर बहुत उत्साह बना हुआ है। और दूसरे विरोध भले हों लेकिन, ये तो सच्चाई है
कि तकनीक के इस दौर में अगर देश को लोगों का एक डाटा बैंक नहीं तैयार होता है, तो
इससे सरकार आगे जाने के बजाए पीछे चली जाएगी। फिर प्रधानमंत्री की जनधन योजना और
सीधे खाते में रकम देने की योजना लागू करने का ये बेहतर तरीका साबित हो रहा था। इसलिए
मोदी सरकार ने मनमोहन सरकार की उस किसी योजना को रोका नहीं। भले उस पर यू टर्न
सरकार होने का ठप्पा लगातार लगा हो। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार ये साफ करते
हैं कि उन्हें लोगों की भलाई के लिए किसी भी अपने फैसले के संशोधन में जरा सा भी
एतराज नहीं है। और यही शायद उनकी सफलता का मंत्र भी है कि वो जनता में गुस्से को
समझ जाते हैं। नरेंद्र मोदी ने फेसबुक मुख्यालय में बातचीत में कहाकि पहले सरकार
को पांच साल बाद जनता के गुस्से का पता चलता था और तब तक देर हो जाती थी। अब लोगों
की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में हर रोज, हर मिनट आ रही है। उन्होंने कहाकि मैं
यहां जो बोल रहा हूं। उस पर भी वोटिंग हो रही होगी कि मोदी अच्छा बोला या खराब। नरेंद्र
मोदी मानते हैं कि वो इस प्रतिक्रिया से खुद को दुरुस्त करते हैं। गवर्नेंस बेहतर
करने की कोशिश करते हैं। इसीलिए वो मुख्य धारा की मीडिया से ज्यादा इस नई मीडिया
की प्रतिक्रिया के आधार पर सरकार चलाने की कोशिश करते हैं। और इस आधार पर फिलहाल
सफल भी होते दिख रहे हैं। ट्विटर, फेसबुक का रिपोर्टर प्रधानमंत्री को जनता की
प्रतिक्रिया बता रहा है। सोशल मीडिया से समाज को समझने वाला स्वयंसेवक
प्रधानमंत्री मिला हुआ है। इसीलिए यू टर्न का ठप्पा इस प्रधानमंत्री को डराता नहीं
है।