इस सरकार ने दाल की महंगाई रोकने के
लिए जितना कुछ किया है। इतना इससे पहले किसी सरकार ने नहीं किया है। लेकिन, इसका
दूसरा तथ्य ये भी है कि इस सरकार की सारी कोशिशों के बावजूद दाल जिस भाव पर जनता
को खरीदनी पड़ रही है। उस भाव पर इतने लंबे समय तक किसी सरकार के समय में नहीं
खरीदनी पड़ी। सरकार बार-बार ये बता रही है कि दाल की कीमतों पर काबू के लिए कितना
कुछ किया जा रहा है। दाल का भंडार पहले डेढ़ लाख टन का किया गया। अब सरकारी दाल
भंडार आठ लाख टन का किया जा रहा है। राज्यों को बार-बार इस बात की ताकीद की जा रही
है कि एक सौ बीस रुपये किलो ऊपर के भाव पर दाल को न बिकने दें। हर कुछ दिनों में
सरकार बताती है कि कितनी दाल आयात की जा रही है। लेकिन, इस सबके बावजूद दिल्ली की
संसद के नजदीक के केंद्रीय भंडार तक में दाल एक सौ चालीस रुपये के नीचे बमुश्किल
ही मिल पा रही है। इसी बीच टमाटर और आलू के भाव भी अचानक मंडी में मजबूती से सरकार
की नाकामयाबी को बताने लगे। और सबसे बड़ी बात ये हुई कि देश के रिजर्व बैंक गवर्नर
ने ये कहते हुए ब्याज दरें घटाने से इनकार कर दिया कि महंगाई दर फिर से बढ़ना शुरू
हो गई है। हालांकि, रिजर्व बैंक ने अपने उस अनुमान में ये नहीं बताया कि लगातार
सत्रह महीने महंगाई दर घटने के बाद अप्रैल का महीना है जब महंगाई दर फिर से बढ़ने
लगी है। अब सवाल ये है कि अगर नजदीक की मंडी से लेकर रिजर्व बैंक गवर्नर के
पूर्वानुमान तक में महंगाई डायन की तरह मुंह बाए खड़ी दिख रही है, तो क्या
अर्थव्यवस्था में अच्छी खबरें होने की बात की जा सकती है।   

दरअसल रेपो रेट न घटाने के रिजर्व
बैंक गवर्नर के तर्क ने देश में ये संदेश मजबूत किया है कि महंगाई फिलहाल बढ़ती ही
जा रही है और इस लिहाज से देश के लोगों के लिए अच्छे दिन जल्दी आने वाले नहीं हैं।
और दरअसल सच भी यही है कि देश के लोगों के जेब में सीधे आई कमाई और उनकी जेब से
निकलकर खर्च हो गई रकम ही सबसे बड़ा पैमाना होता है कि उनके अच्छे दिए आए या नहीं।
इस लिहाज से जनता को अच्छे दिन का अहसास कतई नहीं हो रहा है। लेकिन, जैसे किसी
व्यक्ति की एक बुराई के लिहाज से उसको सिर्फ बुरा नहीं कहा जा सकता। वैसे ही इस
समय देश की बढ़ती महंगाई के लिहाज से पूरी अर्थव्यवस्था को बुरा कहना ठीक नहीं
होगा। जब दाल, टमाटर, आलू की महंगाई पर मीडिया सुर्ख है। उसी समय ये भी खबर आई है
कि देश का चालू खाते का घाटा जनवरी-मार्च में घटकर सिर्फ करोड़ डॉलर रह गया है। चालू
खाते का घाटा मतलब आयात-निर्यात का संतुलन। और घाटा घटने का मतलब हुआ कि
आयात-निर्यात का संतुलन बेहतर हुआ है। हालांकि, आयात-निर्यात दोनों ही घटा है। मार्च
2016 को खत्म वित्तीय वर्ष में चालू खाते का घाटा जीडीपी का कुल एक दशमलव एक
प्रतिशत रह गया है। जबकि, पिछले वित्तीय वर्ष में घाटा एक दशमलव आठ प्रतिशत था। इसका
सीधा मतलब ये हुआ कि कुल जीडीपी का करीब एक प्रतिशत सरकार को पिछले वित्तीय वर्ष
में विदेशों से आयात करने में कम खर्चना पड़ा है। इससे भी रुपये कीमत को स्थिरता
मिली है। हालांकि, सरकार के लिए ये सावधानी बरतने की चेतावनी देने वाले आंकड़े
हैं। क्योंकि, चालू खाते के घाटे की बड़ी वजह कच्चे तेल और दूसरी कमोडिटीज की
दुनिया में गिरती कीमतें हैं। लेकिन, ये अर्थव्यवस्था के अच्छे दिनों की बेहतर खबर
है। अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन की खबर आम आदमी के अच्छे दिन की खबर से कैसे जुड़ी
है। इसे समझने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष के इंडिया मिशन चीफ पॉल कशिन की
बात सुननी चाहिए। पॉल कह रहे हैं कि इस समय भारत की स्थिति काफी अच्छी दिख रही है।
निश्चित तौर पर इस अच्छी स्थिति की बड़ी वजह कच्चे तेल की कम कीमतें हैं। इससे सभी
भारतीय की असल आमदनी बढ़ी है। आईएमएफ ने 2015-16 के लिए 7.3 प्रतिशत और 2016-17 के
लिए तरक्की की रफ्तार साढ़े सात प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। तरक्की की इस
रफ्तार की बुनियाद पक्की दिखती है। अर्थव्यवस्था में कारों की बिक्री भी एक बड़ा
संकेत होता है कि लोगों के पास रकम है या नहीं। अप्रैल महीने में कारों की बिक्री
ग्यारह प्रतिशत बढ़ी है। अप्रैल के आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि ये इस
वित्तीय वर्ष का पहला महीना है। जिस तरह से मॉनसून बेहतर होने का अनुमान है। इससे ग्रामीण
क्षेत्र में भी ट्रैक्टर, मशीनरी की बिक्री बढ़ेगी। कारों की बिक्री बेहतर होने से
कार कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों की बेहतरी की खबरें आ रही हैं। दुनिया की
ज्यादातर कार बनाने वाली कंपनियां भारत के बाजार को ध्यान में रखकर नीति बना रही
हैं। भारत में उत्पादन यूनिट लगाने से कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों का कारोबार
बहतर हुआ है। रेटिंग एजेंसी इकरा का अनुमान है कि कार के पुर्जे बनाने वाली
कंपनियों की तरक्की इस साल करीब दस प्रतिशत की होगी। और ये
तरक्की की रफ्तार ज्यादातर क्षेत्रों में होती दिख रही है। सरकार के उदारीकरण के
नए फैसले इसे और गति देंगे। नए शहर बनाने से लेकर बुनियादी सुविधाओं में सरकार का
तेजी से बढ़ता खर्च अर्थव्यवस्था की तेजी में मदद कर रहा है। प्रत्यक्ष विदेशी
निवेश को लेकर सरकार के ताजा फैसले की कड़ी समीक्षा की जा सकती है। और सबसे बड़ी
आलोचना ये तो है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी जब 2013 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
के लिए इससे बहुत कम उदारता के खिलाफ थी, तो क्या हो गया कि 2016 में वो पूरे
दरवाजे खोल रही है और प्रधानमंत्री ये सीना ठोंककर कह रहे हैं कि हम दुनिया की
सबसे खुली अर्थव्यवस्था हैं। उदारवादी नीतियां कितनी ठीक हैं या नहीं। ये दूसरी
बहस है लेकिन, इतना तो तय है कि किसी भी देश की आर्थिक नीतियां एक समय में अगर एक
दिशा में ही जाएंगी, तो ही आगे बढ़ सकती हैं। उदाहरण के लिए पूर्व प्रधानमंत्री
डॉक्टर मनमोहन सिंह की 2004-2009 की सरकार के फैसलों में शायद ही कोई ऐसा फैसला
खोजा जा सके, जिसे बताकर कहा जा सके कि इससे देश की तरक्की रुक गई। हालांकि, 2009
के चुनावों के पहले साठ हजार करोड़ रुपये की किसानों की कर्ज माफी पूरी तरह से
सोनिया की अपनी वोटबैंक की राजनीति थी। और माना जाता है कि कर्ज माफी और मनरेगा
दोनों ही सही लोगों के फायदे की वजह नहीं बन सके और इससे सरकार की नीतियों के दो
दिशा में चलने का भ्रम भी पैदा हुआ। यहां तक कि जिस आधुनिक आर्थिक नीति पर इंडिया
दुनिया के अगुवा देशों में खड़ा दिख रहा है। वो पूरी की पूरी नरसिंहा राव के
दुनिया के लिए बाजार खोलने की नीति की बुनियाद पर ही बनी थी। कम से कम इस लिहाज से
देखें, तो 1991 के बाद 2016 इंडियन इकोनॉमिक पॉलिसी में बदलाव की एक बड़ी तारीख के
तौर पर याद किया जाएगा। जाहिर है इससे दुनिया के निवेशक भारतीय वीसा के लिए आवेदन
करने में देरी नहीं लगाएंगे। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था के लिहाज से ढेर सारी ऐसी
खबरें हैं जो, भारत की उस प्रतिष्ठा को मजबूत करती हैं। जिसमें दुनिया अर्थव्यवस्था
ठीक रखने के लिए चमकते भारत की तरफ देख रही हैं।

लेकिन, ये नरेंद्र मोदी सरकार को ये
बहुत अच्छे से समझना होगा कि जनता के लिए अच्छे दिन का सिर्फ और सिर्फ एक पैमाना
है कि सरकार की नीतियों से उसकी जेब में कितनी ज्यादा रकम आई और जब वो घर का खर्च
चला रहा है, तो कितनी रकम उसकी जेब से गई। और भले ही महंगाई के बढ़ने की दर मनमोहन
सरकार के करीब दस प्रतिशत से मोदी सरकार में करीब पांच प्रतिशत ही हो। लेकिन, महंगाई
दर के बढ़ने के संकेत जनता को अच्छे दिन का अहसास कतई नहीं दे रहे हैं। डेढ़ सौ
रुपये किलो की दाल तरक्की की रफ्तार और दूसरे अर्थव्यवस्था के अच्छे आंकड़ों को
बिना डकारे हजम कर रही है। साहेब समझिए कि महंगाई अर्थव्यवस्था की सारी अच्छी
खबरों को खाए जा रही है। अच्छा है कि बारिश अच्छी होने के संकेत हैं। लेकिन, खेत
से बाजार तक की व्यवस्था में बुनियादी बदलाव नहीं हुआ तो अच्छे दिन सिर्फ जुमला ही
रह जाएगा।  
(ये लेख सोपान स्टेप पत्रिका के ताजा अंक में छपा है)