संजय दत्त को जेल हो गई है। इससे देश-समाज में बहुत लोग दुखी हो गए हैं। सबको लगता है कि संजू बाबा, अब ज्यादातर लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं, ने इधर तो कोई ऐसा अपराध किया नहीं है। जिसके लिए उन्हें जेल भेज दिया जाए। वैसे इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होंगे, जिन्हें बंबई 93 धमाकों के सभी अभियुक्तों के लिए फांसी की सजा भी कम लगती होगी। फिर संजय दत्त को सजा मिलने से लोग दुखी क्यों हैं।
दरअसल लोग संजय दत्त को नहीं मुन्नाभाई को सजा मिलने से दुखी है। वो मुन्नाभाई जो, बॉक्स ऑफिस पर अच्छे बिजनेस की गारंटी बन गया। वो, मुन्नाभाई जो, गांधीजी के मरने के करीब पांच दशकों के बाद गांधीवाद को गांधीगिरी में बदलकर नए जमाने के लोगों को भी हंसाता है, रुलाता है और वो गांधीगिरी से ही एक सुंदर सी गर्लफ्रेंड भी पा लेता है।

लोगों को उस मुन्नाभाई के जेल जाने से दुख है जिसके ऊपर अभी कम से कम फिल्म इंडस्ट्री की 100 करोड़ रुपए दांव पर लगा हुआ है, 100 करोड़ सिर्फ उन फिल्मों की कीमत है, जिनकी शूटिंग अधर में लटक गई है।
मुन्नाभाई के जेल जाने से वो लोग भी दुखी हैं। जो, ज्यादातर मुन्नाभाई की स्टाइल में ही जिंदगी आगे बढ़ाने की ख्वाहिश रखते हैं। यानी पहले दादागिरी, उससे हासिल रुतबा, फिर जब मामला अंटकता दिखे तो, फिर सहारा गांधीगिरी का। और, फिर सबका चहेता मुन्नाभाई बन जाना।

मुन्नाभाई के जेल जाने से वो भी दुखी हैं। जो, फिल्मी स्टाइल की ही जिंदगी जीना चाहते थे। कुछ इस अंदाज वाले भी दुखी हैं, जो सोचते हैं कि बदनाम भी हुए तो, क्या नाम न होगा। लेकिन, बदनाम होकर नाम मिलना तो तभी सही है ना, जब उस नाम के दम पर दुनिया से कुछ हासिल हो सकेगा। जेल में रहकर तो कुछ हासिल होने से रहा।

मुन्नाभाई के जेल जाने से समाज का वो रुतबे वाला तबका भी दुखी है। जिसका प्यारा सा मासूम बच्चा कम उम्र में शराब पीकर सड़क के किनारे फुटपाथ पर सो रहे गरीब लोगों को कुचल देता है।
मुन्नाभाई के जेल जाने से वो भी दुखी हैं जिनके बच्चे जवानी के जोश में आकर किसी कमजोर महिला के साथ बलात्कार कर देते हैं।

मुन्नाभाई के जेल जाने से वो लोग भी दुखी हैं जो, जरा से मजे के लिए जंगल में गैरकानूनी तरीके से जानवरों का शिकार करते हैं।

दरअसल मुन्नाभाई के जेल जाने से हर वो तबका दुखी है। जिसको किसी न किसी वजह से लगता है कि अगर वो कोई गलती करेगा तो, कानून का ही कोई न कोई रास्ता उसे बचाने में काम आ जाएगा।
संजय दत्त को सजा सुनाए जाने के दिन से पहले जिस तरह से मीडिया के जरिए टाडा स्पेशल कोर्ट के जज पी डी कोडे पर भावनात्मक तौर पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। उससे साफ था कि समाज का प्रभावशाली तबका किस तरह से काम करता है। संजय दत्त ने अपने बचाव में ये तक दलील दे डाली कि उन्हें डर था कि उनकी बहनों के साथ बलात्कार हो सकता है, इसलिए उन्होंने ए के 56 राइफल रख ली थी। सजा सुनाए जाते समय भी संजय दत्त ने सारे भावनात्मक हथकंडे अपनाए। कहा- उनकी बहन मां बनने वाली है, इसलिए उन्हें सरेंडर करने के लिए समय दिया जाए। वैसे जज साहब इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसी कोई दलील नहीं सुनी जो, कानूनी तौर पर सही नहीं हो।

वैसे संजय दत्त के मामले में 14 साल की देरी ने भी ढेर सारे लोगों को संजय दत्त (मुन्नाभाई) के पक्ष में खड़ा कर दिया था। जिस मामले में 14 साल पहले ही संजय को जेल जाना था। संजय दत्त के साथ इस मामले के ज्यादातर आरोपी जो, पकड़ में आए वो, 14 सालों से अपने घर-परिवार-समाज से कटे जेल की रोटी खा रहे थे। जज ने फैसला सुनाते हुए कहा भी कि पिछले 14 सालों में बाहर रहकर संजय दत्त मे पैसा, प्रतिष्ठा, बेहतर जिंदगी सबकुछ पाई। लेकिन, अब करनी की भरपाई का समय आ गया है।

सुनील दत्त जैसे सम्मानित और एक बेहतर जिंदगी वाले शख्स का बेटा होने से भी संजय दत्त के जेल जाने से दुखी लोगों की कतार बढ़ गई।

संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त के मुंबई से सांसद बनने ने भी मुन्नाभाई के साथ सहानुभूति रखने वालों की गिनती बढ़ा दी।

एक अच्छे एक्टर के तौर पर संजय दत्त मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। मुन्नाभाई का किरदार भी मुझे बहुत अच्छा लगा। फिल्म की मैंने जमकर तारीफ की, वैसे सभी कर रहे थे, मेरे करने न करने से कुछ नहीं होता। लेकिन, संजय दत्त के जेल जाने से मैं दुखी नहीं हूं। क्योंकि, अगर इन वजहों से कोई अपराध करके कानून से बचने लगा तो, इस देश में बढ़ते करोड़पतियों की तरह अपराध करके मुन्नाभाई बनने वाले भी बढ़ते चले जाएंगे। इसलिए मैं मुन्नाभाई के जेल जाने से दुखी नहीं हूं। मैं इसलिए दुखी नहीं कि अगर मुन्नाभाई जेल न गया होता तो, लोगों को लगता कि मेमन परिवार के सदस्यों को बलि का बकरा बना दिया गया। और, संजय दत्त को हीरो बनाकर बाहर निकाल लिया गया।


3 Comments

अनिल रघुराज · August 2, 2007 at 8:49 am

बिलकुल सही कहा कि, ‘मुन्नाभाई के जेल जाने से हर वो तबका दुखी है। जिसको किसी न किसी वजह से लगता है कि अगर वो कोई गलती करेगा तो, कानून का ही कोई न कोई रास्ता उसे बचाने में काम आ जाएगा।’ और मैं इस तबके में शामिल नहीं हूं, इसलिए हर्ष बाबू आपकी तरह मैं भी दुखी नहीं हूं।

Mayank · August 2, 2007 at 9:59 am

Very well said. We have sympathy for Munnabhai. We have sympathy for Sanjay Dutt who lost his mother quite early in his life. But who gave him licence to get away with anything.

arun kumar · August 7, 2007 at 3:56 pm

मुन्नाभाई के लिए आंसू बहाने वाले वो सब लोग हैं जिनके दामन किसी न किसी तरह के अपराध में रंगे हुए हैं। ऐसी इंडस्ट्री जिसने अंडरवर्ल्ड और अपराधियों से मदद ली, उन्हें Establish होने का मौका दिया और अब रो रहे हैं। क्योंकि कहीं न कहीं डर है कि अगर ऐसे ही कानून सख्त होता गया तो आज मुन्नाभाई कल सलमान भाई, परसों भरत भाई सब की बारी आ सकती है। अगर मुन्नाभाई को सजा देने के बाद अचानक भारतीय
अ(न्याय) विभाग की अंतरात्मा जाग गई तो समझिए सब गए 12 के भाव से। हर्ष इस मामले में तुम्हारी राय एकदम सटीक है। बस एक अफसोस है कि तुम बेबाक तो नजर आए पर एकदम शरीफ और सभ्य अंदाज में। महेश भट्ट से लेकर किरण खेर तक सबको कष्ट हो रहा है, क्योंकि इनके इमोशन दरअसल बिके हुए हैं, भई अपनी जात का आदमी था चलो दुख जता दो। वो भी इसलिए कि अभी कोई खतरा नहीं दिख रहा है, वरना से सबके सब अपने अपने घरों में दुबके होते। याद नहीं जब संजयदत्त पहली बार गिरफ्तार हुए थे टाडा में बस छिप गए थे, या फिर जब भरत शाह जब्त हो गए थे, य़े सबसे डरपोक तबका है जोकि सिर्फ अपना मतलब देखता है। खैर उससे भी बड़ी बात ये है कि संजय दत्त से सहानुभूति नहीं रखना चाहिए क्योंकि अगर ऐसा है तो फिर याकूब मेनन ने क्या बिगाड़ा था, वो भी भावनाओं में बह गया। अगर संजय दत्त की दलील है कि दंगाई उन्हें धमका रहे थे। जब इसके लिए वो आतंकवादियों का साथ दे सकता है तो बेचारे याकूब और उसके जैसे लोगों के तो नाते रिश्तेदार दंगों में मारे गए थे वो इसे जायज क्यों नहीं ठहराएगा? इसलिए भाइयो और बहनों संजय पर आंसू मत बहाइए.

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