असल विकास तब जब, किसान खेत में हंसता और बाजार दरवाजे पर इंतजार करता दिखे

20 दिसम्बर को दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में

4 लड़कों ने मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए उनके घर में बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी थी। लेकिन, 4 शहरों ने मोदी-शाह की जमीन बचा ली। अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वड़ोदरा- यही वे 4 शहर हैं, जहां से भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए जरूरी जीत मिली है। अहमदाबाद की 16 में से 12 सीटें बचाने में भारतीय जनता पार्टी कामयाब रही। सूरत की सभी 9 शहरी सीटों पर कमल खिल गया। वड़ोदरा की 4 शहरी सीटें भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने वाले नतीजे दे गईं और राजकोट की 3 शहरी सीटें बीजेपी के लिए जीवनदायिनी रहीं क्योंकि, इसमें मुख्यमंत्री विजय रूपानी की भी सीट रही। विजय रूपानी ने राजकोट पश्चिम सीट पर 131586 मत हासिल किया। इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी इंद्रनील राजगुरू को 77831 मत मिले। जिस सूरत शहर को पाटीदार आंदोलन और जीएसटी के खिलाफ गुस्से के केंद्र के तौर पर देखा जा रहा था। उस सूरत शहर में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को जबरदस्त सफलता मिली है। सूरत पश्चिम से बीजेपी प्रत्याशी पूर्णेश मोदी को 111615 मत मिले जबकि, कांग्रेस प्रत्याशी इकबाल दाउद को सिर्फ 33733 मत मिले। इसी तरह वड़ोदरा शहर सीट पर बीजेपी प्रत्याशी मनीषा वकील को 116367 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी अनिल परमार को 63984 मत मिले।

अहमदाबाद की मणिनगर (नरेंद्र मोदी की पुरानी विधानसभा) सीट पर बीजेपी प्रत्याशी सुरेश पटेल को 116113 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी श्वेताबेन को 40914 मत मिले। इसी तरह अमित शाह की पुरानी विधानसभा सीट नारनपुरा में बीजेपी प्रत्याशी कौशिक पटेल को 106458 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी नितिन पटेल को 40243 मत मिले। पूर्व मुख्यमंत्री आनन्दीबेनपटेल की  विधानसभा सीट रही घाटलोडिया से बीजेपी प्रत्याशी भूपेंद्र पटेल को 175652 मत मिले और कांग्रेस प्रत्याशी शशिकान्त पटेल को 57902 मतों से ही संतोष करना पड़ा। इसी तरह साबरमती से बीजेपी प्रत्याशी अरविंद दलाल 113503 मत हासिल करके सीट जीती। जबकि, कांग्रेस प्रत्याशी जीतू पटेल 44693 मतों पर ही सिमट गए। अहमदाबाद, सूरत, राजकोट और वड़ोदरा की शहरी सीटों पर बीजेपी प्रत्याशी 30000-70000 के भारी अंतर से जीते हैं। इन शहरी सीटों पर भारतीय जनता प्रत्याशी को मिले जबरदस्त वोट और जीत का भारी अंतर दिखाता है कि भारतीय जनता पार्टी का अपने पक्के शहरी मतदाताओं में भरोसा बढ़ा है। 55 विशुद्ध शहरी सीटों में से 44 पर कमल खिला है। लेकिन, शहरी मतदाताओं में जबरदस्त भरोसा सिर्फ गुजरात मॉडल की देन नहीं है। शहरी मतदाताओं में भारतीय जनता पार्टी को हमेशा से अच्छा वोट मिलता रहा है। इसे अच्छी तरीके से समझने के लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा और शहरी निकाय चुनावों के नतीजों को देखना चाहिए। 2012 में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें हासिल करके सरकार बना ली थी और भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 47 सीटें मिली थीं। लेकिन, उसके तुरंत बाद हुए नगर निकाय चुनावों में 12 में से 8 मेयर बीजेपी के ही जीते। 2007  में भी भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश की 12 में से 8 मेयर सीटें जीत ली थीं। जबकि, उसके ठीक पहले हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 51 सीटें मिली थीं। उस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने 206 सीटें हासिल करके सरकार बनाई थी। ये आंकड़े बताते हैं कि, शहरी-पढ़ा लिखा मतदाता बीजेपी के साथ किस तरह से जुड़ा हुआ है। इसलिए गुजरात में शहरी सीटों पर बीजेपी का जीतना कोई अचंभा नहीं है। हां, इतना जरूर है कि बीजेपी सरकार की नीतियों से गुजरात में शहर और ज्यादा सुविधा वाले, बेहतर हुए हैं। लेकिन, गांवों में उस अनुपात में आमदनी और सुविधा न बढ़ने का नुकसान अब बीजेपी को हो सकता है। और, काफी हद तक इसकी आहट 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में दिखी भी है। गांव की सीटों पर बीजेपी का प्रदर्शन बिगड़ा है। इन चुनावों में 109 ग्रामीण सीटों में से 63 सीटें कांग्रेस ने जीत ली हैं। पहले से 23 सीटें ज्यादा इस बार कांग्रेस ने जीती हैं। बीजेपी को 43 सीटें मिली हैं। लेकिन, ये साफ है कि, गुजरात में शहरों और गांवों के बीच की खाई लगातार बढ़ी है। अहमदाबाद चुनावों के दौरान टैक्सी ड्राइवर रंजीत झाला ने हंसते हुए कहा- उद्योग लगने से जमीनों के भाव तो 10 गुना मिल गए लेकिन, किसान उपजाएगा कहां और क्या इंपोर्ट करके खाएगा ? ये एक बड़ी मुश्किल की ओर इशारा है।

गुजरात में विकास जबरदस्त हुआ है, इस पर सन्देह नहीं किया जा सकता। लेकिन, उस विकास में ग्रामीणों, किसानों और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों को हिस्सेदारी कितनी रही, इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। और, 2019 की लड़ाई में ये सवाल और बड़ा होगा। इसका अनुमान उसी समय लग गया था जब, संसद मार्ग पर देश भर से आए किसान संगठनों ने किसान पंचायत के जरिए अपनी ताकत दिखाई थी। हालांकि, इस बात का अन्दाजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अच्छे से है। इसीलिए राष्ट्रीय कृषि बाजार और दूसरी योजनाओं के जरिए किसानों की आमदनी दोगुना करने का लक्ष्य तय किया गया है। लेकिन, असली मुश्किल यही है कि क्या 2019 के पहले किसानों को उनकी उपज का कितना बेहतर भाव मिल सकेगा। जिस न्यू इंडिया की बात प्रधानमंत्री कर रहे हैं, उसमें कृषि प्रधान भारत की हिस्सेदारी कितनी होगी और कैसे होगी, ये बताना, दिखना जरूरी हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात-हिमाचल प्रदेश के चुनाव जीतने के बाद के भाषण में जीतेगा भाई जीतेगा, विकास ही जीतेगा का नारा लगाकर 2019 का चुनावी सुर तय कर दिया है। लेकिन, इस सुर को ग्रामीण भारत अच्छे से नहीं लगा पाया तो, चुनावी संगीत बेसुरा होने का खतरा बढ़ेगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार उद्योगपतियों पर हमला करके किसानों, ग्रामीण भारत के साथ खड़े होने की कोशिश करते दिख रहे हैं। गुजरात चुनाव ने राहुल गांधी की नेता वाली छवि पहले से बहुत दुरुस्त की है। इंडिया बनाम भारत की बात लम्बे समय से कही जा रही है। 2019 का चुनाव इंडिया बनाम भारत यानी शहर बनाम गांव की तरफ जाता दिख रहा है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को 2019 में मजबूती के लिए जरूरी है कि शहरी पार्टी वाली छवि को जल्द से जल्द दुरुस्त किया जाए। किसान अपने खेत में हंसता नजर आए और बाजार उसके दरवाजे खड़ा इंतजार करे, तभी असल विकास माना जाएगा। और, तब देश का नारा होगा- जीतेगा भाई जीतेगा, विकास ही जीतेगा।

(यह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में छपा है।)