आम आदमी पार्टी 70 में 67 लेकर आई थी तो, असम गण परिषद के बाद देश की पहली ऐसी पार्टी बन गई थी, जिसे आन्दोलन से सीधे सत्ता हासिल हो गई हो। बहुत पहले मैंने लिखा था कि, आम आदमी पार्टी भी असम गण परिषद की राह पर है। लेकिन, आज राज्यसभा के उम्मीदवारों का नाम सुनने के बाद मुझे यह बात समझ में आ रही है कि, क्या वजह होती होगी कि, 2 दशक बाद ही कोई बड़ा आन्दोलन खड़ा हो पाता है। ध्यान से देखें तो, देश में लगभग हर 2 दशक में भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आन्दोलन होता रहा है और उससे सत्ता भी बदलती रही है। अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन भी ऐसा ही था। लेकिन, भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आन्दोलन को सत्ता प्राप्ति में अरविन्द ने सलीके से बदल लिया। आज राज्यसभा सीटों के एलान के बाद अरविन्द ने वो काम कर दिया है कि, कम से कम अन्ना आन्दोलन के समय शामिल रही पीढ़ी ऐसे किसी आन्दोलन में शायद ही शरीक होने का साहस जुटा सके। अरविन्द ने देश को बड़ा धोखा दिया है। दूसरी पार्टियां भी यही करती हैं, इस तर्क के साथ अरविन्द के साथ आंख मूंदे खड़े लोगों को एक छोटी गणना जरूर करना चाहिए। गणना यह कि, कांग्रेस,भाजपा या दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कितने राज्यसभा सांसद भेजने का अवसर मिला और उसमें से कितने “थैलीशाह” उन्होंने भेजे। फिर अरविन्द की आम आदमी पार्टी तो सबसे अलग थी जी ! एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता को राज्यसभा भेजकर आम आदमी पार्टी ने आम आदमी की पार्टी की नई परिभाषा तैयार की है। अरविन्द केजरीवाल जी का स्पष्ट कहना है कि, हम राजनीति बदलने आए हैं जी। और, इसे उन्होंने साबित भी किया। संजय सिंह भी राज्यसभा पहुंचेगे, बधाई। अन्ना आन्दोलन के समय रिपोर्टिंग करते मेरे चेहरे की एक पर्त उतर गई थी। लग रहा था कि, देश की बेहतरी के लिए एक आन्दोलन का हिस्सा बना हूं। अब लग रहा है, कितना बड़ा धोखा हो गया। अरविन्द के इस फ्रॉड को देखने वाली पीढ़ी भला कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी आन्दोलन के लिए तैयार हो पाएगी।


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