बीजेपी का घोषणापत्र अब तक जारी नहीं हुआ है। लेकिन, ये कांग्रेस दो हाथ आगे दिखेगा। आखिर घोषणापत्र होता तो सिर्फ कहने के लिए ही होता है। इसलिए कांग्रेस ने पहले जो कहा उससे कुछ आगे तो बीजेपी वालों को कहना ही होगा। बानगी दिख गई है- गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आडवाणी के लोकसभा क्षेत्र गांधीनगर में पहली चुनावी रैली में ही ये कह गए कि चावल 2 रुपए किलो मिलेगा।

नरेंद्र मोदी का 2 रुपए किलो चावल/गेहूं का फॉर्मूला शायद ही गुजरात में ज्यादा असर करता हो। लेकिन, देश भर में तो जमकर असर करता ही है। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राजकोट से 22 किलोमीटर दूर एक गांव राजसमढियाला गया। इस गांव की सालाना कमाई है करीब पांच करोड़ रुपए। 350 परिवारों वाले इस गांव के ज्यादातर लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन खेती ही है। लेकिन, इस गांव की कई ऐसी खासियत हैं जिसके बाद शहर में रहने वाले भी इनके सामने पानी भरते नजर आएं। 2003 में ही इस गांव की सारी सड़कें कंक्रीट की बन गईं। 350 परिवारों के गांव में करीब 30 कारें हैं तो, 400 मोटरसाइकिल।

इस गांव में कांग्रेस के 3 रुपए किलो और नरेंद्र मोदी के 2 रुपए किलो चावल का कोई खरीदार नहीं है। और, इस गांव में न तो गरीबी मुद्दा है न वोट बैंक है। क्योंकि, गांव में अब कोई परिवार गरीबी रेखा के नीचे नहीं है। इस गांव की गरीबी रेखा भी सरकारी गरीबी रेखा से इतना ऊपर है कि वो अमीर है। सरकारी गरीबी रेखा साल के साढ़े बारह हजार रुपए कमाने वालों की है। जबकि, राजकोट के इस गांव में एक लाख रुपए से कम कमाने वाला परिवार गरीबी रेखा के नीचे माना जाता है।

गांव में विकास के नाम पर नेता वोट मांगने से डरते हैं। विकास में ये सरकारों की भागीदारी अच्छे से लेते हैं। यही वजह है कि चुनावों के समय भी इस गांव में कोई भी चुनावी माहौल नजर नहीं आता। न किसी पार्टी का झंडा न बैनर। गांव बाद में एक साथ बैठकर तय करते हैं कि वोट किसे करना है। लेकिन, जागरुक इतने कि अगर किसी ने वोट नहीं डाला तो, पांच सौ रुपए का जुर्माना भी है।

लेकिन, ये तो गुजरात के एक गांव की अपनी इच्छाशक्ति है कि वहां गरीब नहीं है और गरीबी मुद्दा नहीं है इसलिए गरीबों का वोटबैंक भी नहीं है। लेकिन, पूरे देश में गरीबों का ये वोटबैंक- जाति, धर्म, कम्युनल, सेक्युलर सबसे ज्यादा बड़ा है और आसानी से पकड़ में भी आ जाता है। दरअसल ये 2 रुपए-3 रुपए किलो चावल/गेहूं सरकारी खजाने को भले ही जमकर चोट पहुंचाता हो और जिनको ये दिया जाता है उन लोगों को अगले चुनाव तक फिर उसी हाल में रहने का आधार तैयार कर देता है कि वो तथाकथित सरकारी गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवार यानी BPL परिवारों में शामिल रहें। इस तरह के एलानों से वोट थोक में मिलते हैं और चुनाव के बाद चूंकि इन BPL परिवारों की चर्चा न तो मीडिया में होती है न तो, राजनीतिक पार्टियों में तो, कोई अलोकप्रिय होने का खतरा भी नहीं होता है।

कांग्रेस तो, पिछले करीब 35 सालों से हर चुनावी घोषणापत्र में गरीबी हटाने की बात कर रही है। कांग्रेस है तो, गांधी परिवार की विरासत कैसे भूल सकती है। इंदिरा गांधी को गरीबी हटाओ के नारे ने ही प्रधानमंत्री बना दिया था। इसलिए कांग्रेस के घोषणापत्र पर हाय गरीब-हाय गरीबी हावी हो गई। कांग्रेस ने कहा कि उनकी सरकार बनती है तो, गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को 3 रुपए किलो गेहूं, चावल दिया जाएगा। यानी देश पर सबसे ज्यादा समय तक राज करने वाली कांग्रेस ने लगे हाथ ये मान लिया कि गरीबी की रेखा के नीचे इतने लोग हैं कि वो, वोट देकर उसे चुनाव जिता सकते हैं वो, भी सिर्फ तीन किलो चावल-गेहूं के लिए।

कांग्रेस एक फूड सिक्योरिटी एक्ट की भी बात कर रही है जिसमें सबको खाना देने का वादा है। इसके लिए नेशनल फूड सिक्योरिटी एक्ट बनेगा। कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना उसकी सबसे बड़ी यूएसपी है। इसीलिए वो, नरेगा योजना में लोगों को 100 दिन रोजगार के साथ 20 रुपए ज्यादा रोजाना की मजूरी यानी 100 रुपए की मजूरी का भी पक्का वादा कर रही है। जाहिर है ये फूड सिक्योरिटी एक्ट से खाना, नरेगा की मजदूरी वही लोग करेंगे जिनका जीवनस्तर आजादी के 62 सालों बाद भी इस लायक नहीं हो पाया है कि वो अपने अगल-बगल खुले चमकते डिपार्टमेंटल स्टोरों, मॉल से खरीदारी न कर सकें।

रहमान की जय हो धुन को जब ऑस्कर सम्मान मिला तो, कांग्रेस को लगा कि इससे बेहतर स्लोगन चुनाव जीतने के लिए हो ही नहीं सकता। आखिर, ये धुन तो दुनिया जीतकर लौटी है तो, इसके बूते कांग्रेस को देश का राज जीतने में भला क्यों मुश्किल होगी। लेकिन, स्लमडॉग मिलिनेयर फिल्म के बच्चों से मिलने की तस्वीरें जब टीवी चैनलों पर झुग्गी वाले भारत की कहानी दिखाने लगीं तो, कांग्रेस को लगा शायद थोड़ी गलती हो गई है। तब से कांग्रेस ने जय हो गाने की धुन जरा धीमी कर दी है।

कांग्रेस कह रही है कि उसका राज आया तो, सबको शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी। महंगाई कम करने और तेज विकास का वादा भी किया गया है। छोटे उद्योगों को मदद दी जाएगी। नौजवान बेरोजगार नहीं रहेगा इसका भी भरोसा दिलाने की कोशिश है।

सोनिया के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाषण दे रहे हैं कि देश से गरीबी हटाने में अभी 15-20 साल लगेंगे। यानी अगले करीब चार लोकसभा चुनावों तक चुनावी घोषणापत्रों में सस्ते गेहूं-चावल और 100 रुपए की मजूरी पर जनता को लुभाया जाता रहेगा। क्योंकि, दुनिया के अमीरों में हमारे अमीरों के जब और आगे बढ़ने की खबर आती है तो, दूसरी सच्चाई जो थोड़ा धीरे से सुनाई जाती है जिससे फीलगुड कम न हो वो, ये है कि भारत की एक बड़ी आबादी अभी रोजाना एक बिसलेरी की बोतल यानी 20 रुपए से भी कम में गुजारा करती है।

मुद्दों की बात होती है तो, किसी भी सर्वे में अब गरीबी जैसा मुद्दा होता-दिखता ही नहीं है। लेकिन, दरअसल ये गरीब और गरीबी इस देश का सबसे बड़ा वोटबैंक है जो, चुनावों तक पार्टियों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होता है। लेकिन, जैसे ही वोट बैलट बॉक्स में गए गरीबों की किस्मत और उनकी चर्चा भी अगले चुनाव तक ताले में ही चली जाती है। भारतीय लोकतंत्र में गरीबों का वोट जय हो। चुनाव तक गरीबों की भी जय हो …


3 Comments

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey · April 1, 2009 at 11:44 am

गरीबी बड़ी प्रेशस (precious) चीज है चुनाव में।

Abhishek Mishra · April 3, 2009 at 11:44 am

Vakai 5 salon tak ‘Fool’ banaane ki taiyari hai!

Mumukshh Ki Rachanain · April 6, 2009 at 2:44 am

बढ़िया प्रस्तुति.
सरकार बनाने के लिए सब्जबाग दिखाना और फिर सरकार बनाने के बाद बेवकूफ बनाने की पंचवर्षीय प्रक्रिया पर अमल ही ज्यादा होता दिखाई देता है . आखिर ६२ वर्षों की नाकामी का जवाब कौन देगा?

चन्द्र मोहन गुप्त

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