कल दिल्ली के टाउनहॉल में बीजेपी और बीएसपी के सभासद (पार्षद) एक दूसरे से भिड़ गए। बीजेपी के सभासद संख्याबल में ज्यादा थे। इसलिए उन्होंने बीएसपी के सभासदों को पीट दिया।2009 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने हैं। उसकी ये एक बानगी भर थी। दरअसल अब नगर निगम से लेकर लोकसभा तक ऐसे नेता (बहुतायत में) चुनाव लड़ते-जीतते हैं जिनके लिए समाजसेवा कभी कोई मकसद ही नहीं होता है। उनके लिए नगर निगम, विधानसभा या फिर लोकसभा तक पहुंचना सिर्फ और सिर्फ अपनी उस हैसियत (दबंगई) को बनाए रखने या फिर उसे और बढ़ाने के लिए होता है। और, फिर जब इस हैसियत पर कोई उनकी बिरादरी की भी हमला करता है। तो, फिर वो हमलावर हो जाते हैं।ये कोई पहला मामला नहीं है। जब किसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर लोकतंत्र के पहरेदारों ने ही लोकतंत्र की अस्मिता पर हमला किया हो। इससे पहले उत्तर प्रदेश और बिहार के ही नेता बदनाम थे कि वहां के नेता गुंडे, लुच्चे लफंगे होते हैं। और, विधानसभा तक एक दूसरे से गाली-गलौज-मारपीट पर आमादा हो जाते हैं। वैसे हाथापाई और मारपीट का दिल्ली के टाउन हॉल से कुछ मिलता-जुलता नजारा देश की राजधानी में पहले भी हो चुका है।

लोकसभा में साधु यादव और जनता दल यूनाइटेड के सांसद प्रभुनाथ सिंह के बीच मारपीट होते होते ही बची थी। लोकसभा का मामला था। दूसरे नेताओं ने शर्माशर्मी बचाव किया। अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब आंध्र प्रदेश की विधानसभा में कांग्रेसी मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी ने पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को मां की ऐसी गाली दी जो, शायद संभ्रांत परिवारों में गलती से भी सुन लिए जाने पर बच्चे या फिर बड़े के कान लाल कर दिए जाते हैं। लेकिन, जब राज्य के मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री का मामला हो तो, फिर भला सजा कौन देगा। हल्की-फुल्की प्रतिक्रियाओं के अलावा इस पर न तो, कांग्रेस न ही विपक्षी दलों ने संसदीय मर्यादा को लेकर हो-हल्ला किया। शायद सबको डर था कि कल उनके पार्टी ने ऐसा किया तो, दूसरे ज्यादा हल्ला मचाएंगे।
मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के बीच इस हद तक गिरने का मामला ये पहला नहीं है। इससे पहले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अब की मुख्यमंत्री मायावती के साथ एक जमाने में वीवीआईपी गेस्ट हाउस में जो घिनौना कृत्य करने की कोशिश की थी। वो, आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कलंक की ही तरह है। मायावती के साथ दुर्व्यवहार किया गया वो तो, भला हो कि बीजेपी के कुछ नेता पहुंच गए और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर एक गहरी कालिख पुतने से बच गई। लेकिन, यही बीजेपी के नेता भी उत्तर प्रदेश की विधानसभा में हुई मारपीट शामिल हुए। माइक तोड़े गए, विधानसभा अध्यक्ष तक की कुर्सी पर माइक फेंके गए। अब तो नगर निगमों, विधानसभाओं और लोकसभा में ऐसे लोग पहुंचने लगे हैं। जिनको इन लोकतंत्र की संस्थाओं के बाहर छोड़ने या फिर लेने ले जाने के लिए बंदूकधारियों का एक पूरा अमला आता-जाता है। ऐसे में अगर लोकतंत्र की इन संस्थाओं के भीतर भी इस तरह की गुंडागर्दी शुरू हो गई तो, फिर कोई कैसे काले कारनामे करने वाले सफेदपोश नेताओं की करतूत के खिलाफ लोकतंत्र में आवाज उठा पाएगा। ये वो लोग हैं जो, कानून और नियम कायदे बनाते हैं। और, ये जिस जगह चुनकर भेजे जाते हैं मकसद यही होता है कि कम से कम वहां तो कायदे-कानून-नियमों का पालन होगा।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के ठीक पहले राज्य के ही गृह विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक तिहाई से ज्यादा वर्तमान विधायक अपराधी चरित्र वाले थे। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के पहले मैंने उत्तर प्रदेश के गृह विभाग की रिपोर्ट के बाद ये लिखा था कि पांच साल में एक ही दिन होता है जब, बैलट बुलेट पर भारी होता है। उत्तर प्रदेश, बिहार में राज तो बदला है लेकिन, बाहुबली कहे जाने वाले अपराधी विधायक अभी भी विधानसभा तक पहुंच ही रहे हैं। सभी दल इनको पाल पोस रहे हैं। 60 साल का आजाद भारत हर क्षेत्र में तरक्की पर है। दुनिया में नाम कमा रहा है। लेकिन, 60 साल के आजाद भारत के इन नेताओं की करतूतें देखकर ये समझ में आ जाता है कि भारत की कद्र को बट्टा क्यों लग जाता है। 60 साल बाद भी अगर सब कुछ होते हुए भी देश तरक्की की राह से भटक जाता है तो, उसके लिए जिम्मेदार कौन है। जरूरत इस बात की है कि सभी दलों के वो नेता जो अभी भी इससे बचे हैं वो, मिलकर इसके खिलाफ मोर्चाबंदी करें। बीजेपी और बीएसपी दोनों को ही चाहिए कि मारपीट करने वाले अपने सभासदों को पार्टी से निकाल बाहर करें। लेकिन, राजनीतिक पार्टियों के अब तक के चरित्र को देखते हुए ये मुश्किल ही लगता है। इसलिए ये काम आजाद भारत की जनता को ही करना होगा। क्योंकि, जो खुद ही कानून तोड़ने की हरसंभव कोशिश करते रहते हैं उनके हाथ देश के लोगों के लिए कानून बनाने और उन्हें न्याय देने का काम कैसे सौंपा जा सकता है।