ये यात्रा बिल्कुल तय नहीं थी। सच तो ये था कि ये यात्रा हमारे मित्र मनीष शुक्ला की वजह से हुई। बहुत दिनों से मनीष कह रहे थे कि बद्रीनाथ दर्शन को जाना है। इच्छा हमारी भी थी लेकिन, परिवार के साथ। समस्या इसमें ये थी कि परिवार के साथ जाने के लिए समय ज्यादा चाहिए था। और, छोटे बच्चों को लेकर जाने के लिए अपनी मन:स्थिति के साथ बच्चों की स्थिति का भी ख्याल रखना था। तो, तय हुआ और हम दोनों मित्र निकल पड़े। शुक्रवार की रात 11.55 पर नई दिल्ली स्टेशन से दिल्ली-देहरादून एसी एक्सप्रेस से निकले। टिकट भी जुगाड़ डॉट कॉम से पक्का हुआ। ठीक चार बजे हम लोग हरिद्वार स्टेशन पर थे। अचानक नींद खुली तो, उठकर देखा तो, हरिद्वार आ गए थे। जल्दी से मनीष को भी जगाया और सीधे पहुंचे वेटिंग रूम में। टैक्सी वाला समय का पक्का था। फोन किया और वहीं वेटिंग रुम में फ्रेश हुए और चाय पीकर शुरू हो गई यात्रा।
बद्रीनाथ के रास्ते में भूस्खलन के बाद रास्ते की सफाई
ऋषिकेश से ऊपर डराने वाली सड़कों का डर मनोहारी दृश्य काफी कम कर देते हैं। हम लोग चूंकि समय से करीब पांच बजे हरिद्वार से निकल चुके थे इसलिए रास्ता खाली मिल रहा था। लेकिन, प्राकृतिक बाधाओं के निशान निरंतर मिल रहे थे। हां, अच्छी बात ये रही कि कहीं भी प्राकृतिक व्यवधान 5-10 मिनट से ज्यादा का नहीं रहा। सीमा सड़क संगठन के लोग किस तरह से काम कर रहे हैं। और, उनके काम की वजह से ही पहाड़ों में लोगों की सुखद, सुरक्षित यात्राएं संभव भी हैं। उनके काम को सलाम।
जेपी हाइड्रोप्रोजेक्ट के आसपास शानदार सड़कें
लेकिन, एक और बात जो, ज्यादातर गलत नजरिये से ही देखी जाती है। वो, है निजी कंपनियों को दिया जाने वाला काम। उत्तराखंड में जेपी ग्रुप कई बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। जेपी के हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के आसपास पहुंचते ही खतरनाक पहाड़ों पर भी चिकनी मैदानों जैसी शानदार सड़क नजर आने लगती है। शायद उसके पीछे बड़ी वजह ये होगी कि छोटा हिस्सा उनके पास प्रबंधन के लिए है और वहां से मिलने वाले मुनाफे की वजह से वो, लगातार उसे बनाते रहते होंगे। लेकिन, मुझे लगता है कि अगर सरकारें निजी कंपनियों को प्रोजेक्ट देने के साथ उन पर ये दबाव भी निरंतर बनाए रखें कि वो, उस इलाके का बेहतर प्रबंधन करें और उन्हें सामाजिक सुरक्षा के साथ आधारभूत सुविधाएं देने की भी शर्त रखें तो, शायद सच में पब्लिक प्राइवेंट पार्टनरशिप का मतलब निकलकर आएगा। क्योंकि, प्राकृतिक संसाधनों से युक्त उत्तराखंड जैसे राज्य में पर्यटन ही वहां के लोगों की रोजी-रोटी का जरिया बनता है। अब अगर निजी कंपनियां आधारभूत सुविधाएं बेहतर करेंगी तो, निश्चित है पर्यटक भी ज्यादा आएंगे और स्थानीय लोगों की कमाई भी बढ़ेगी। वैसे, उत्तराखंड सरकार वहां के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में कमी नहीं छोड़ रही है। शायद जरूरत भी होगी। जेपी के अलावा जीवीके, जीएमआर और दूसरी कई कंपनियों के बोर्ड बद्रीनाथ के ही रास्ते में हमें दिख गए। ज्यादातर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट वाले ही थे। सरकारी कंपनी एनटीपीसी तो है ही।
बद्रीनाथ जाते समय श्रीनगर से आगे बन रहा बड़ा बांध
श्रीनगर के पास भी एक बड़ा बांध बन रहा है। समय की कमी की वजह से ये तो मैं नहीं जान पाया कि ये किसी निजी कंपनी के मुनाफे का जरिया बन रहा है या फिर सिर्फ सरकार और लोगों के सचमुच के साधन जुटाने की कोशिश है। वैसे, जितना बड़ा बांध बन रहा है जाहिर है, अबाध वेग से आती नदी को ऐसे रोकेंगे तो, भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं को निमंत्रण मिल ही जाएगा।



हेमकुंडसाहिब से श्रद्धालुओं को लेकर लौटता हेलीकॉप्टर



वैसे, उद्यमिता स्वभाव का हिस्सा होती है। कैप्टन गोपीनाथ याद हैं ना। अरे वही सबसे सस्ते हवाई सफर की शुरुआत करने वाले या यूं कहें कि रेल और बस से सफर करने वाले को हवाई सफर कराने वाले। कैप्टन गोपीनाथ की डेक्कन एयरवेज हालांकि, लिवलाइफ किंग साइज वाले वियज माल्या ने खरीद ली और उसे किंगफिशर रेड बनाकर लो कॉस्ट एयरलाइन बनाए रखा। अब सुन रहे हैं माल्या साहब को कम दाम वाली एयरलाइन शान पर धब्बा लग रही है इसलिए उसे खत्म कर रहे हैं। लेकिन, उद्यमी गोपीनाथ ने पहले कार्गो सेवा डेक्कन 360 शुरू की। और, अब बद्रीनाथ यात्रा के दौरान जब हवा में उड़ता हेलीकॉप्टर दिखा तो, गाड़ी रुकवाकर मैंने जानना चाहा कि किस कंपनी ने कहां के लिए ये हवाई सफर शुरू किया है। उतरते ही हेलीपैड के पास डेक्कन का बोर्ड दिखा। पूछा तो, पता चला वही बंगलुरू वाले कैप्टन गोपीनाथ हैं। अब छोटे जहाज से यात्रियों को करीब चार हजार में हेमकुंड साहिब के और नजदीक ले जाते हैं और वापसी का टिकट डिस्काउंट पर ढाई हजार में ही मिल जाता है। गोपीनाथ उद्यमी हैं। उन्हें पता है हेमकुंड साहिब के दर्शन को आने वाले लोगों के पास पैसे ज्यादा हैं और वक्त कम। देखिए कैप्टन साहब बद्रीनाथ, केदारनाथ कब तक लो कॉस्ट में हवाई सफर कराते हैं।
पाण्डुकेश्वर गेट पर केसर,शिलाजीत बेचता 14 साल का दिलीप
धंधा तो, फिर धंधा होता है। छोटा हो या फिर बड़ा। कैप्टन हवाई जहाज से आसमान तक हैं तो, पाण्डुकेश्वर में एक और उद्यमी मिला। 14 साल का दिलीप। वो, भी हवाई सफर कराने का यकीन दिलाता है। हालांकि, उसका धंधा थोड़ा अलग है। वो, केसर और शिलाजीत बेचता है। हमने गाड़ी का शीशा उतारा तो, दिल्ली कहने लगा- शिलाजीत जोड़ों और कमर के दर्द से मुक्ति दिलाता है। ये मार्केटिंग फंडा काम नहीं आया तो, उसने तुरंत अमोघ अस्त्र छोड़ा। मजा आ जाएगा साहब शिलाजीत खाने के बाद सेक्स पावर बढ़ जाता है। खैर, हमें तो सेक्स पावर बढ़ाने की इच्छा थी नहीं इसलिए बच गए। लेकिन, बहुतेरे होंगे जो, ये बिना सोचे कि अगर ये सच का केसर-शिलाजीत होता तो, ये इतने बुरे हाल में इसे बेचते क्यों फिरते, खरीद लेते होंगे। दिलीप ने हमारा सामान्य ज्ञान बढ़ाया कि शिलाजीत मतलब- पत्थर का पसीना। जाहिर है पत्थर का पसीना होगा तो, फिर … । वैसे, पाण्डुकेश्वर में पुलिस वाले जानबूझकर गेट लगा देते हैं जिससे वहां के दिलीप जैसे धंधेबाजों को थोड़ा कमाई का मौका मिल जाए। इस गेट पर शॉल, कंबल सब मिलता है।
पीछे दिख रही इसी धर्मशाला में हम रुके
बद्रीनाथ किसी का स्थाई घर नहीं है। क्योंकि, जैसे ही बर्फ पड़नी शुरू होती है। बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाएंगे और, सेना वहां की धर्मशालाओं, घरों और दुकानों को सील करके अपना कैंप बना लेती है। वैसे, हर तरह के खाने, रहने का इंतजाम वहां है। ज्यादातर अच्छे आश्रम हैं जो, सचमुच उचित दर पर रहने का इंतजाम कर देते हैं। लेकिन, कई आश्रम ऐसे भी हैं जिनको सरकार ने वहां बड़ी जमीन आवंटित कर दी है और वो, डीलक्स, सुपर डीलक्स कैटेगरी के कमरे के किराए भक्तों से ग्राहक के अंदाज में ले रहे हैं। इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। खैर, हमें सचमुच के आश्रम में जगह मिली। सुबह 5 बजे हरिद्वार से हम लोग निकले थे और रास्ते में एक जगह चाय और पीपलकोटी में खाना खाने के अलावा हम कहीं रुके नहीं थी। पाण्डुकेश्वर गेट पर थोड़ा और एकाध जगह तस्वीरें लेने में भले थोड़ी देर रुके हों या फिर भूस्खलन की वजह से। इस सबके बाद भी हम 5 बजते-बजते बद्रीनाथ पहुंच गए थे।
बद्रीविशाल के दर्शन के बाद मंदिर के बाहर
आश्रम में गए। फ्रेश हुए। फ्रेश होने के बाद तक वहां ठंड बढ़ चुकी थी। जैकेट तो, पहले ही हम पहन चुके थे। इनर की भी सख्त जरूरत महसूस होने लगी। पानी जहां भी छू रहा था लग रहा था वो, जगह सुन्न हो गई है। जल्दी से एक चाय पी गई और सीधे चल पड़े मंदिर की ओर। मंदिर के सामने तप्तकुंड का पानी कुछ ज्यादा ही गरम था। क्योंकि, शाम की वजह से लोग कम थे। वैसे, इस कुंड के बारे में मान्यता यही है कि ये पानी गरम कितना भी हो। शरीर जलता नहीं है और न ही छाले पड़ते हैं। हमें भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। हम लोगों ने स्नान किया। प्रसाद की थाली लेकर मंदिर में पहुंच गए। ऑफ सीजन होने से भीड़ नहीं थी। आराम से बद्रीविशाल के दर्शन हुए।
सुबह के दर्शन के बाद
दर्शन से लौटकर थोड़ी देर सामने की बाजार में घूमे और फिर सोने की कोशिश में लेट गए। जिससे सुबह जल्दी उठकर सुबह का एक दर्शन और कर लें। सुबह की आरती का रेट ज्यादा था तो, हम लोगों ने तय किया कि सामान्य दर्शन ही सुबह का करेंगे। साढ़े छे बजे के बाद सामान्य दर्शन शुरू हो जाता है। लेकिन, नींद सुबह करीब तीन बजे से ही खुल गई। क्योंकि, हम मंदिर के सबसे नजदीक की धर्मशाला/आश्रम में थे। सुबह तीन बजे से ही घंटे और मंत्रोच्चार से नींद खुल गई। लेकिन, हमें पता था कि साढ़े छे के पहले मंदिर पहुंचने का फायदा नहीं। इसलिए साढ़े पांच बजे उठे। ठंड भगाने के लिए एक चाय और फिर तप्तकुंड में स्नान और सुबह का भव्य दर्शन हुआ। दर्शन के बाद वापस आकर सामने के रेस्टोरेंट में आकर चाय पी और इडली सांभर नाश्ता किया। और, ठीक साढ़े सात बजे बद्रीनाथ से हरिद्वार के लिए निकल पड़े।
एकाधन जगह चाय पीने के बाद इस बार भोजन हम लोगों ने किया श्रीनगर में। श्रीनगर बड़ा सेंटर। विश्वविद्यालय होने की वजह से नौजवान नजर आते हैं। रौनक बनी रहती है। छात्र राजनीति के जरिए आगे बढ़ने की चाह रखने वाले छात्रनेताओं के पोस्टर भी दिखे। वहां से चले तो, ऋषिकेश के पहले एक और चाय पी। और, पांच बजे तक हरिद्वार में प्रवेश हो गया। हरिद्वार घुसते ही तेज बारिश। अब मुझे दिल्ली लौटना था और हमारे मित्र मनीष को लखनऊ। उन्हें वहां से जौनपुर लौटना था। पता किया गया। दिल्ली के लिए रात दस बजे की वॉल्वो थी और लखनऊ के लिए 9.50 की दून एक्सप्रेस। वॉल्वो का मैंने टिकट बुक कराया और जीआरपी सीओ की मदद से दून एक्सप्रेस का एक पक्का टिकट। रात ढाई बजे वॉल्वो ने मुझे वसुंधरा के सामने एनएच 58 पर उतार दिया। शुक्रवार की रात 11.55 पर दिल्ली से निकले और रविवार की रात 2.37 मिनट पर वसुंधरा गाजियाबाद वापस।
दरअसल, हरिद्वार में एक बार रुकने की इच्छा भी हो रही थी थकान की वजह से। लेकिन, अगले दिन सोमवार को शहर में 32 रुपए और गांव में 26 रुपए रोजाना से ज्यादा कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर बताने वाले अपने हलफनामे पर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के साथ मिलकर सफाई पेश करने वाले थे। इसलिए हरिद्वार रुकने का जो, थोड़ा मन भी बना था वो, रद्द हुआ। हालांकि, मोंटेक, जयराम की सफाई और भ्रम फैला गई।

5 Comments

जाट देवता (संदीप पवाँर) · October 4, 2011 at 11:49 am

ऐसी यात्राए बहुत की है मैंने बस अन्तर वाहन का था। पब्लिक प्राइवेंट पार्टनरशिप के अलावा कोई चारा भी नहीं है, धन्धा तो करना उन लोगों से जाने।

प्रवीण पाण्डेय · October 4, 2011 at 5:19 pm

आपको इस यात्रा को पुण्य मिले।

Vivek Rastogi · October 4, 2011 at 5:29 pm

बेहतरीन फ़ोटो के साथ शानदार वृत्तांत, जय बद्री विशाल

ajit gupta · October 5, 2011 at 1:21 pm

हमने भी इसी बहाने यात्रा कर ली।

अजित वडनेरकर · October 11, 2011 at 1:01 pm

इस सुपरफास्ट तीर्थयात्रा का लुत्फ़ हमने भी ले लिया। हरिद्वार ने ननिहाल का नाता होने के बावजूद ऋषिकेश-देहरादून से आगे कभी जा नहीं पाए। आपका पचास मिनट का रोमांच ईर्ष्यालु बना रहा है।

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