गुजरात दंगों जैसा ही है नंदीग्राम का नरसंहार। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन के चेयरमैन जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने ये बात कही है। राजेंद्र बाबू कह रहे हैं कि जिस तरह से नंदीग्राम में अल्पसंख्यकों पर राज्य प्रायोजित अत्याचार हो रहा है वो, किसी भी तरह से गोधरा के बाद हुए गुजरात के दंगों से कम नहीं है। लेकिन, मुझे लगता है कि गुजरात दंगों से भी ज्यादा जघन्य कृत्य नंदीग्राम में हुआ है। नरेंद्र मोदी में भी कभी ये साहस नहीं हुआ कि वो उसे सही ठहराते लेकिन, बौराए बुद्धदेव तो इसे सही भी ठहरा रहे हैं।

दरअसल नंदीग्राम में स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है जितनी राजेंद्र बाबू कह रहे हैं। लेफ्ट के गुडों का नंगा नाच अभी भी खुलेआम चल रहा है। बंगाल की बुद्धदेव सरकार अब सीआरपीएफ को काम नहीं करने दे रही है। सीआरपीएफ के देरी से आने का रोना रोने वाले बुद्धदेव के बंगाल के डीजीपी अनूप भूषण वोहरा ने सीआरपीएफ के डीआईजी को कहा है कि वो वही सुनें जो, राज्य पुलिस का स्थानीय एसपी (ईस्ट मिदनापुर) एस एस पांडा कह रहा हो। यानी केंद्र सरकार की ओर से राज्य में कानून व्यवस्था बनाने के लिए भेजी गई सीआरपीएफ पूरी तरह से राज्य पुलिस के इशारे पर चलेगी।

ये वही राज्य पुलिस है जो, लेफ्ट कैडर के इशारे के बिना सांस भी नहीं लेती। सीपीएम कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर नंदीग्राम के निरीह किसानों की हत्या करने वाली पुलिस अब जो कहेगी वही सीआरपीएफ के जवानों को करना होगा। सीआरपीएफ के डीआईजी आलोक राज ने राज्य पुलिस से नंदीग्राम और आसपास के इलाके के अपराधियों की एक सूची मांगी थी अब तक सीआरपीएफ को वो सूची नहीं दी गई। आलोक राज ने कहा पुलिस का इतना गंदा रवैया उन्होंने अपने अब तक के कार्यकाल में नहीं देखा है।

सीआरपीएफ के 5 बेस कैंपों को हटाकर दूसरी जगह भेजा जा रहा है। ये वही बेस कैंप हैं जिन्हें बनाने के लिए सीआरपीएफ को लेफ्ट के अत्याधुनिक हथियारों, बमों से लैस गुंडों से छीनने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। इतना कुछ होने के बावजूद सीपीएम महासचिव की बेशर्म बीवी और सीपीएम पोलित ब्यूरो की पहली महिला सदस्य बृंदा करात टीवी चैनल पर नंदीग्राम के मसले पर इंटरव्यू के दौरान नंदीग्राम में महिलाओं के साथ हुए बलात्कार की तो चर्चा भी नहीं करना चाहतीं। और, वो इसी इंटरव्यू के दौरान बेशर्मी से हंसती भी दिख जाती है।

वहीं एक दूसरे चैनल पर सीपीआई नेता ए बी वर्धन नंदीग्राम को गुजरात से भी गंदा बताने पर भड़क जाते हैं। इन बेशर्मों को ये नहीं दिख रहा है कि नंदीग्राम के एक स्कूल में 1,200 से भी ज्यादा किसान शरण लिए हुए हैं। ये लोग भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के सदस्य हैं। अब स्कूल का हेडमास्टर सीपीएम के दबाव में उन्हें स्कूल खाली करने को कह रहा है। कमेटी के 38 से ज्यादा सदस्य अभी भी लापता हैं। आशंका हैं कि गांव में कब्जे के दौरान सीपीएम कैडर ने इन लोगों की हत्याकर उनकी लाश कहीं निपटा दी है।


6 Comments

Gyandutt Pandey · November 19, 2007 at 12:51 pm

यह उत्पीड़न तो जगह जगह हो रहा है। घर के स्तर पर तो बहू जलाई जा रही है। राज्य देश के स्तर पर नन्दीग्राम-गोधरा हैं। यूपी/बिहार में जो हो रहा है वह कम वीभत्स नहीं। नक्सली हिंसा का भी क्या तर्क है।
इस सब के बारे में क्या कहें?
सिनिकल बनने की बजाय विकास की बात ज्यादा दूर तक जायेगी – शायद।

भुवन भास्कर · November 19, 2007 at 3:19 pm

नंदीग्राम में हिंसा और उसके बाद निर्लज्ज वामपंथी प्रतिक्रियाओं को पढ़-सुनकर मन में इतनी घृणा और इतना आक्रोश पैदा होता है कि मैं डरता हूं कहीं भाषा मर्यादा की सीमा को पार न कर जाए। गोधरा के बाद हुए गुजरात के दंगों पर 5 साल तक छाती कूटते रहे इन लाल झंडियों का कृत्य देखिए। मोदी के राज में हुए विभत्स और शर्मनाक दंगों ने कम से कम हर मंच पर मोदी को बगलें झांकने पर मज़बूर तो किया। वाजपेयी ने कम से कम मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत तो दी। लेकिन इन निर्लज्जों को तो देखिए। मुख्यमंत्री बुद्धदेव हत्यारों, बलात्कारियों को अपना आदमी बताता है और कहता है कि वो अत्याचार कानूनी और नैतिक दोनों ही तरह से उचित थे। दूसरी ओर बेशर्म बृंदा करात है जो कहती है कि नंदीग्राम की घटनाएं चिंताजनक तो ज़रूर हैं, लेकिन शर्मनाक नहीं है। क्या कहा जाए इन्हें। माओ और स्तालिन की आत्माएं अट्टहास कर रही होंगी कि उनके अंदर का पिशाच अब भी बुद्धदेवों और बृंदाओं में ज़िंदा है। धिक्कार है…

इष्ट देव सांकृत्यायन · November 20, 2007 at 3:51 pm

बिलकुल ठीक फरमाया. बल्कि गुजरात से थोडा ज्यादा ही बीभत्स और घिनौना खेल वहाँ हो रहा है.

Mrs. Asha Joglekar · November 22, 2007 at 12:25 am

सोच रहे थे कि अब तो कमयुलिसटों को शर्म आयेगी पर ये तो सब घोल कर पी गये ।

Mrs. Asha Joglekar · November 22, 2007 at 12:26 am

पढिये
कम्युनिस्टों को

Sanjay Sharma · November 23, 2007 at 6:53 am

राम को नकारता , नाम सीताराम ! राजनीति ? गरीबों का ! -पहनावा इम्पोर्टेड पैंट-शर्ट ! ५ इम्पोर्टेड कुता पालन कर्म मे शामिल ! शौक भी हो सकता है . एक कुता पर एक अफसर का खर्च आता है ऐसा कहा जाता है .
तो एक भारतीय होने के नाते हम चिंता जाहिर करना चाहते है. कुते के बदले ५ गरीब मानव क्यों नही पाला जाता इनसे ? मान लिया गरीब मानव से घृणा है इन्हें तो क्या भारतीय कुते भी नफ़रत के काविल है .मात्र
दो रोटी सुबह दो रोटी शाम काफ़ी होता है २४ घंटे की ड्यूटी लेने के लिए . पर शौषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने
वाली पार्टी क्यों चार रोटी पर २४ घंटे का शोषण का पाप लिया जाय . विदेशी कुते को परतंत्र बनाने का सौभाग्य प्राप्त विरले को ही होता है . देशी कुते स्वतंत्र हैं किसी की रोटी छिनने मे . किसी मेहनतकश मजदूर की हांडी मे मुह मारने को . रोज ही कलुआ का कलेवा गली का आवारा कुता खा जाता है क्योंकि बिना दरवाजे की झोपडी मे कालू रहता है .दुःख तो नही आश्चर्य होता है उसके झोपडी पर लाल झंडा देखकर !
मैं कांग्रेसी ,मैं भाजपा, मैं पूंजीवादी, मैं समाजवादी, मैं फांसिवादी, मैं गांधीवादी , चाहता हूँ कम से कम उन विदेशी कुते को आजाद करों देशी कुते को परतंत्र करो . ताकि कालू मेरा पड़ोसी कुते की गुंडागर्दी से बचा रहे .

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