हैदराबाद में एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस में एक डराने वाली बात सामने आई है कि 2050 तक करीब 3 करोड़ लड़कों को शादी के लिए लड़की नहीं मिलेगी। भारत में गर्भ में ही लड़कियों को मार देने का चलन न रुक पाने की वजह से लड़कों-लड़कियों के बीच का अनुपात घटता ही जा रहा है। लेकिन, अभी भी भारतीय समाज शायद इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहा है। ये कितना बड़ा खतरा है इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश के एक गांव की कहानी से लगाया जा सकता है। यहां अभी ही लड़कियां खोजने से नहीं मिल रही हैं। शाहजहांपुर के बहादुरपुर गांव में दस से बारह लड़कों के बीच में अकेली लड़की परिवारों में जन्म ले पा रही है। सिर्फ एक गांव की ये बुरी हालत नहीं है। जिले की सदर तहसील में लड़कों के आधे से थोड़ी ज्यादा ही लड़कियां हैं। सदर तहसील में 1,000 लड़कों पर सिर्फ 535 लड़कियां हैं।

शाहजहांपुर के शहरी इलाके में भी लड़कों के लिए लड़कियां खोजे नहीं मिल रही है। 1,000 लड़कों के बीच सिर्फ 678 लड़कियां हैं। हाल ये है कि एक-एक परिवारों में छे-छे लड़कों के बीच में अकेली बहनें हैं। शाहजहांपुर में लड़कियों को गर्भ में ही मार देने का चलन ऐसा है कि खुद महिलाएं अबॉर्शन की बात मानती हैं। वो, भी खुश हैं कि बेटी की शादी के लिए दहेज जुटाने की चिंता से वो मुक्त हैं। लड़कियों के हर क्षेत्र में लड़कों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के बाद भी हर साल एक करोड़ लड़कियों को गर्भ में ही मार दिया जाता है। मुझे समझ में नहीं आता कि वो कौन से लोग हैं जो, अपने ही बच्चे को गर्भ में मारकर दहेज बचा लेने की चिंता दूर होने से खुश होते हैं। मैं तो, अब ये सोचता हूं कि हमारे समाज के वो लोग ज्यादा भले हैं जिन्होंने लड़कों की चाहत में कई लड़कियों को जन्म दिया। कम से कम यहां लड़के की चाहत किसी लड़की जिंदगी तो नहीं ले रही है।
पता नहीं कब हम भारतीय ये समझ पाएंगे कि दस लड़के पैदा करने से अच्छा है कि एक-दो लड़कियों को ही इतनी अच्छी परवरिश दे दी जाए कि वो लड़के भी उनकी किस्मत से रश्क करें। उम्मीद करता हूं कि कम से कम हमारी पीढ़ी 2050 में आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसी सामाजिक विसंगति तैयार करके नहीं देगी।


6 Comments

Udan Tashtari · November 2, 2007 at 1:23 am

हद है भाई. आज भी ऐसा हो रहा है देख कर और सुन कर आश्चर्य होता है. कब सुधरेगा समाज और कैसे. जन चेतना के नाम पर दुनिया भर का ढकोसला और सत्य यह!! शर्मिंदगी लगती है.

अनूप शुक्ल · November 2, 2007 at 2:37 am

ये तो अच्छा हुआ हम पहले ही विवाहित हो गये।

Srijan Shilpi · November 2, 2007 at 9:11 am

आपकी बातों में से ही आपको चिंता करने के लिए एक दूसरा आधार भी दे रहा हूं। उन तीन करोड़ अविवाहित लोगों में से ज्यादातर या तो आत्महत्या कर लेंगे या फिर देश-दुनिया की प्रतिकूल परिस्थितियों की वजह से मारे जाएंगे या फिर क्रांतिकारी अथवा आतंकवादी बन जाएंगे।

Sagar Chand Nahar · November 2, 2007 at 2:43 pm

हमारे राजस्थानी समाज में भी यह हाल है कि हजारों लड़के 30+ हो गये हैं पर उन्हें लड़की नहीं मिल रही है।
कई लोग तो अब महाराष्‍ट्र, के रत्‍नागिरी, अमरावती और इंदौर आदि की तरफ लड़कियों को 5-15 लाख रुपये देकर विवाह कर रहे हैं।
आपकी यह पंक्‍तियाँ बहुत सही लगी
मैं तो, अब ये सोचता हूं कि हमारे समाज के वो लोग ज्यादा भले हैं जिन्होंने लड़कों की चाहत में कई लड़कियों को जन्म दिया।
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

Gyandutt Pandey · November 2, 2007 at 3:34 pm

पता नहीं मानव समाज पर अर्थ-शास्त्र के नियम चलते हैं या नहीं; पर चलें तो यह होगा कि उत्तरोत्तर डिमाण्ड-सप्लाई बैलेंस बिगड़ने से नारी वर्ग का महत्व बढ़ेगा और सोच बदलेगी।

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