इलाहाबाद में मैं जब तक था एक बड़ी गलतफहमी थी कि भारत की पढ़ाई दुनिया के दूसरे देशों से बहुत अच्छी है। शहर में डेढ़-दो लाख लड़के-लड़कियां ज्ञान पेलते दिखते थे। साल भर में 10-20 अपने जानने वाले IAS-PCS हो जाया करते थे। तब लगता था कि दुनिया के किस देश में यहां से ज्यादा पढ़े लिखे लोग होंगे। हर दूसरे लड़के के पास डबल MA की डिग्री होती थी। सब कुछ झमाझम था। लेकिन, इलाहाबाद विश्वविद्यालय को पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था तो, मन मंछ टीस उठती थी कि किसी विदेशी विश्वविद्यालय से तुलना करके उसकी नकल भारत में इलाहाबाद विश्वविद्यालय को क्यों बताया जाता है।

इसकी साफ वजह अब समझ में आ गई है। ब्रिटेन की प्रतिष्ठित लीग टेबल में 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की इस सूची में चीन के 6 विश्वविद्यालय शामिल हैं। एशिया में चीन के अलावा जापान, सिंगापुर, हांगकांग, ताइवान और दक्षिण कोरिया के भी विश्वविद्यालयों को भी इस सूची में जगह मिल गई है।

यहां तक कि दुनिया भर में आपनी धाक जमाने वाला भारत का कोई IIT भी इस सूची में नहीं है। जबकि, इससे पहले एक साथ सारे IIT को मापने से उन्हें इस सूची में जगह मिल जाती थी। गनीमत बस इतनी है कि IIT दिल्ली और IIT मुंबई को दुनिया के 50 सबसे अच्छे तकनीकी संस्थानों में जगह मिल पाई है। लेकिन, ये दोनों भी 37वें और 33वें नंबर पर हैं। जबकि, चीन का सिंगहुआ विश्वविद्यालय 17वें नंबर पर है।

दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की इस लीग लिस्ट में हमेशा की तरह ही अंग्रेज दुनिया का दबदबा कायम है। अमेरिका और ब्रिटेन के विश्वविद्यालय उच्चतर शिक्षा में सबसे आगे हैं। ये बात लगातार सामने आ रही है कि भारत के अच्छे संस्थानों में पढ़ाने के लिए अच्छे अध्यापक नहीं मिल रहे हैं। देश के विश्वविद्यालयों में शोध की हालत बिल्कुल ही खराब है। ऐसे में मनमोहन जी कहां से करिएगा शिक्षा क्रांति। और, उच्चतर शिक्षा की हालत सुधारने बिना तो तरक्की सबको नहीं मिलने वाली। कुछ अंबानी, टाटा, बिड़ला को भले मिल जाए।


5 Comments

पर्यानाद · November 18, 2007 at 4:17 pm

बहुत पहले कभी पढ़ा था कि संसद में एक बार शिक्षा के लिए बजट बढ़ाने को बहस हो रही थी. उस वक्‍त किसी मंत्री ने यह कह कर इसके खिलाफ तर्क दिया था कि यह Non refundable expenditure है. इसे ज्‍यादा नहीं बढ़ाया जा सकता. तो ऐसे में आप हमारे देश के उच्‍च शिक्षा संस्‍थानों के बेहतर होने की उम्‍मीद कैसे कर सकते हैं. अधिकांश युनिवर्सिटीज़ में कोई अकादमिक स्‍तर नाम की चीज लही नहीं है. मेरे शहर की युनिवर्सिटी को केंद्रीय दर्जा देने के लिए बड़ी राजनीति हो रही है. शायद मिल भी जाएगा पर उसके स्‍तर में कोई सुधार नहीं होने वाला यह मैं अभी से जानता हूं. हमपेशा जो ठहरा.

शास्त्री जे सी फिलिप् · November 18, 2007 at 6:16 pm

प्रिय हर्ष,

मैं ने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दो दशाब्दी एक विश्वविद्यालय में बिताये थे (विद्यार्थी, शोध छात्र, यूजीसी विसिटंग प्रोफेसर). मेरा मन तब रोता था.

इन संस्थानों को हम ने ही बर्बाद किया है. अब कम से कम 50 साल लगेंगे इस नुक्सान की भरपाई करने में — शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

रजनीश मंगला · November 18, 2007 at 6:42 pm

लोगों में ये धारणा है कि भारत में शिक्षा का स्तर बहुत ही अच्छा है तभी तो बाहर से भी बहुत से विद्यार्थी यहाँ पढ़ने के लिये आते हैं। मुझे तथ्य नहीं मालूम लेकिन अगर ऐसा है तो बाहर से लोग कोई मैट्रिक, बीए करने तो आते नहीं होंगे। शायद मैडिसन, मैनेजमेंट करने आते होंगे। ये सब शिक्षाएं भारत में अंग्रेज़ी में हैं, पुस्तकें भी अधिकतर विदेशी लेखकों की ही होती हैं। तो जब कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों जैसा ही है (curriculum, books) तो क्यों न बाहर लोग यहाँ सस्ती शिक्षा प्राप्त करने आयेंगे। अंग्रेज़ी उनकी तो मातृभाषा ही है, और भारतीय छात्र सब कुछ अंग्रेज़ी में पढ़ने को मजबूर, उनके सामने अपने ही देश में उल्लूओं की तरह महसूस करते होंगे। आखिर हमारे देश में उच्च शिक्षा भारतीय भाषाओं में क्यों उपलब्ध नहीं हो सकती। भारतीय भाषा में पढ़ने का यह मतलब तो नहीं होगा कि छात्रों को अंग्रेज़ी नहीं आयेगी। लेकिन जब तक ऐसा रहेगा हमारे अधिकतर तथाकथित पढ़े लिखे दुकान पर बैठने लायक ही रहेंगे।

भुवन भास्कर · November 19, 2007 at 2:36 am

आमतौर पर यही माना जाता है कि भारत में प्रारंभिक शिक्षा की हालत भले ही ख़राब हो, उच्चतर शिक्षा में ज़रूर हमारी स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर के क़रीब है। लेकिन इस नए तथ्य ने भारत में शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा का एक और चेहरा प्रस्तुत किया है। दुखद ये है कि इसमें सुधार की कोई कोशिश भी फिलहाल कहीं शुरू होती नहीं दिखती।

Anonymous · November 21, 2007 at 5:37 am

is tark ko mananaa mere liye bahut mushkil hai kii achche teachers nahii mil rahae hai. higher education me selection kii process bahut hii bhrast hai. ristenate daaron aur jii hazoorii karanewalon ko hii vahan jagah miltii hai. mere bahut se jaankar lautnaa chahte hai par koi ummeed nahi dikhtii. kuch apvaad bhii milte hai, isase na nahii kiyaa ja saktaa par ye daal me zeera jaisaa hai.

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