राजनीति अर्थनीति पर हमेशा भारी पड़ती है ये तो समय-समय पर साबित होता रहा है। लेकिन, खुद को सुधारवाद की सबसे बड़ी अगुवा घोषित करने वाली सरकार  5 साल बीतते-बीतते अगर अपने सारे सिद्धांतों को उलट दे तो क्या कहेंगे। यूपीए सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में कुछ ऐसा ही कर रही है। मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने थे तो लगा था कि देश-दुनिया में अर्थशास्त्र के विद्यार्थी, अध्यापक रहते जो कुछ भी उन्होंने सीखा, समझा है उसे ठीक से लागू करेंगे और देश की अर्थव्यवस्था कुछ ऐसी हो जाएगी कि दुनिया के विकसित देशों के साथ हम कंधे से कंधा मिला सकेंगे। मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए जो कमाल किया था, वो भारत के लोगों को अच्छे से याद है। इसीलिए मजबूरी में ही सही जब ऐसा आदमी प्रधानमंत्री बनता दिखा तो नौजवान भारत को लगा कि अब तक सब्सिडी से सरकार और देश चलाने के आदी नेताओं का वक्त खत्म हो गया। क्योंकि, पी वी नरसिंहाराव के प्रधानमंत्री रहते वित्त मंत्री बने मनमोहन सिंह ने वो कर दिखाया था जो, होना संभव ही नहीं था। मनमोहन सिंह ने इस देश को काफी हद तक लालफीताशाही से मुक्ति दिला दी थी। भारत का 1991 दुनिया के लिए मिसाल बना और मौका भी। मनमोहन सिंह की नीतियों का ही असर था कि ये देश दुनिया के लिए खुले मन से बांहे खोलकर खड़ा हो गया था। दुनिया को अनछुआ बाजार दिखा और दुनिया दौड़ पड़ी भारत के बाजार में अपने को सिद्ध करने के लिए। इससे दबाव भारतीय कंपनियों पर भी पड़ा जो, भारत सिर्फ टाटा, बिड़ला का नाम और पंरपराएं लेकर जी रहा था। वो भारत टाटा, बिड़ला का नाम सम्मान से लेने के साथ ये भी पूछने, समझने लगा था कि आखिर दुनिया की दूसरी कंपनियों के साथ मुकाबले में हमारे उद्योगपति कहां हैं। हमारी कंपनियां बनाती क्या हैं, कहां बेचती हैं और दुनिया में इनकी स्थिति क्या है। ये बड़ा परिवर्तन था। लालफीताशाही टूटने का असर था। इंस्पेक्टर राज खत्म होने का असर था। और ये सब किया प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहाराव की खुली छूट के साथ अर्थशास्त्री वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने।

2004 आया। विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया को देश जब स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखा तो सोनिया को मनमोहन सिंह याद आए। बेहद विनम्र व्यवहार के मनमोहन सिंह ने विनम्रता से देश को सपना ये दिखाया कि आर्थिक सुधार ही आज के समय में सारे सुखों की वजह बन सकता है। हालांकि, ये बहस का विषय है कि आर्थिक सुधार क्या है। यूपीए एक के समय शुरू हुआ आर्थिक सुधार के कार्यक्रम में मोटे तौर पर दो बातें शामिल थीं। पहला सबकुछ विदेशियों के लिए खोलना। मतलब साफ था कि अपने बाजार की ताकत दिखाकर विदेशियों को भारत में नए जमाने का विकसित भारत तैयार करने वाला बुनियादी ढांचा तैयार करवाना। साथ ही सब्सिडी देकर समाज के कमजोर तबके को संतुलित करने की जो राजनीतिक प्रक्रिया थी उसे धीरे-धीरे खत्म करना। मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार का कार्यक्रम ये सपना दिखाता था कि दस प्रतिशत की तरक्की की रफ्तार होगी। हर भारतीय की जेब में इतनी रकम होगी कि वो सबकुछ बाजार की कीमत पर खरीद सकेगा। फिर भला सब्सिडी की जरूरत क्यों होगी। और कमाल की बात ये यूपीए एक से यूपीए दो बना तो इसमें जरा सा भी जिक्र सोनिया गांधी की अगुवाई वाली यूपीए एक ने इस बात का नहीं करना जरूरी समझा कि ये चमकते भारत के मनमोहिनी सपने पर वोट मिला। सोनिया गांधी के मनरेगा यानी 100 दिन 100 रुपये की न्यूनतम मजदूरी वाले कार्यक्रम को ही यूपीए दो लाने का पूरा श्रेय दे दिया गया। फिर यूपीए दो भी आया। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश को इसी पर खुश करते रहे कि दुनिया मुसीबत में हैं हम कम मुसीबत में हैं। और वो फिर से सपना दिखाने लगे कि चिंता मत करो अब सब ठीक हो जाएगा। ये अलग बात थी कि भारत सरकार की लुंजपुंज आर्थिक नीतियों की वजह से दुनिया की बाजारू नीति भारत की साख घटाना शुरू कर चुकी थी। फिर बहुप्रतीक्षित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का फैसला भी ले लिया गया। इस भरोसे कि एक वॉलमार्ट या टेस्को आएगा और देश के हर नागरिक को विकसिक देशों के लोगों जैसा अहसास कम से कम खरीदारी करते समय तो देने ही लगेगा। हुआ उल्टा। भारत के संवैधानिक संघीय ढांचे की वजह से दिल्ली, महाराष्ट्र छोड़ कहीं भी दुकान खोलने की इजाजत सलीके से नहीं मिली। हर राज्य की अपनी शर्तें थीं। इतनी शर्तें देखकर विदेशी रिटेलर ऐसे घबड़ाए कि अबतक कोई भी विदेशी मल्टीबांड रिटेलर की दुकान का बोर्ड चमकता नहीं दिख रहा है। खबरें तो ये भी आ रही हैं कि जो अकेला रिटेलर भारत आ भी रहा है टाटा के साथ समझौता करके वो भी सरकार की नाक बचाने के लिए बड़ी लॉबीइंग का नतीजा है। ये तो हुआ मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार के कार्यक्रम का। देश की तरक्की की रफ्तार अब तक घटकर साढ़े चार तक लुढ़क चुकी है।
ये तो था विदेशों से पैसे लाने के सरकारी नीतियों का हाल। लेकिन, बात और बुरी हो गई जब घरेलू हालात दुनिया के बाजार के मुताबिक करने के लिए चल रही योजना भी उलटती दिखने लगी। वो योजना थी धीरे-धीरे सब्सिडी खत्म करने और भारत के लोगों को बाजार की कीमत पर पेट्रोलियम उत्पादों के मिलने का। एकबारगी तो ऐसा लगा कि सरकार कलेजा कड़ा कर चुकी है। उसे देश की तरक्की की चिंता सबसे पहले है वोटबैंक की बाद में। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस सबकी कीमत बाजार तय करने लगा। कहीं पूरी तरह से कहीं आंशिक तौर पर। लेकिन, ये सब तब हो रहा था जब लोकसभा चुनाव में काफी वक्त था। लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए। चार राज्यों में कांग्रेस का खाता बंद हो गया। हर सर्वे यूपीए की किसी भी संभावना तक को दूर-दूर तक नकारने लगा। बस मनमोहन सिंह को प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ गई। ये तक कहना पड़ गया कि मैं नहीं बनूंगा प्रधानमंत्री। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की तालकटोर स्टेडियम की बैठक में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सब्सिडी, कालाबाजारी घटाने की महत्वाकांक्षी 9 सिलिंडर की गैस को 12 सिलिंडर की गैस में बदलने की बात कह दी। तीन बढ़े सिलिंडर से निकली गैस से मनमोहन सिंह और यूपीए की सुधारवादी आर्थिक नीतियों का दम घुटना शुरू हो चुका था। शीर्षासन लोगों की सेहत ठीक करता है। लेकिन, अगर कोई सरकार अपनी आर्थिक नीतियों का शीर्षासन करने लगे तो क्या होगा। कुछ ऐसा ही हुआ है जब देश को सुधारों की पटरी पर दौड़ाते-दौड़ाते यूपीए की सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों में उल्टी दौड़ लगा रही है। लेकिन, मामला यहीं नहीं रुका। अचानक बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस में पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने सीएनजी, पीएनजी के दाम करीब एक तिहाई घटा दिए। लौट के बुद्धू घर को आए की तर्ज पर लौटकर सुधारों से सब्सिडी पर आए। अब जिस रास्ते लौट आए हैं उसे जायज तो ठहराना ही है। दरअसल नेताओं को लगता है कि जनता की याददाश्त बड़ी छोटी होती है। लोकसभा चुनावनजदीक हैं और पिछले साढ़े चार सालों से महंगाई से त्रस्त जनता को 15 रुपए सस्ती सीएनजी और 5 रुपये सस्ती पीएनजी मिलेगी तो वो पिछली महंगाई भला कहां याद रख पाएगी।  मोइली जी कल तक सारे बाजारू फॉर्मूले गिनाकर हर पेट्रोलियम पोडक्ट महंगा कर रहे थे। अचानक उन्होंने सीएनजी-पीएनजी सस्ता करने का फॉर्मूला निकाल दिया। आम लोग बमुश्किल ही समझ पाएंगे कैसे। तरक्की की रफ्तार बढ़ाने वाले उद्योगों के हिस्से की गैस रोक दी गई है और उसे सिटी गैस वितरण कंपनियों को दे दिया गया। अब 100 प्रतिशत सस्ती गैस सिटी गैस वितरण कंपनियों को मिलेगी। उन्हें घरेलू गैस फील्ड वाली सस्ती गैस मिलेगी। महंगी गैस आयात करने से उनको मुक्ति मिली और इसका लाभ जनता को सस्ती सीएनजी-पीएनजी के तौर पर मिलेगा। यूपीए सरकार को उम्मीद यही कि देश की जनता यूपीए 2 के आखिरी दिनों में मिली इस सस्ती गैस का कर्ज यूपीए 3 बनाकर उतार देगा। अब सवाल यही है कि क्या इस जमाने में भी साढ़े चार साल की नीति को साढ़े चार महीने के लिए उल्टा करके सरकार बनाई जा सकेगी। इस प्रयोग का परिणाम मई 2014 में पता चलेगा कि ये प्रयोग सफल हुआ या नहीं।

3 Comments

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · February 5, 2014 at 6:45 am

कांग्रेस वालों का विश्वास अटल है- मतदाता की बेवकूफ़ी, तंगनजरी और कमजोर याददाश्त पर।

ARUN SATHI · February 5, 2014 at 7:24 am

बेहतर….आलेख

प्रवीण पाण्डेय · February 5, 2014 at 1:58 pm

सब सारे उपाय कार्य नहीं करते हैं तो अन्त में पैसा बाँटना ही बचता है।

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