विश्व हिंदू परिषद याद है ना। अरे, वही इलाहाबाद वाले अशोक सिंघल जी जिसके अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे। अपना घर भी एक शोध संस्थान को दे दिया है। गजब के समर्पित व्यक्ति हैं। सिंघल  साहब के बाद गुजरात के एक डॉक्टर प्रणीण तोगड़िया उसकी कमान संभाल रहे थे। जरूरत से ज्यादा उग्रता लिए तोगड़िया साहब की अगुवाई में विहिप सबसे पहले तो, गुजरात से ही गायब हो गया। कहा जाता है कि गुजरात में हुए दंगों में मोदी सरकार से ज्यादा भूमिका विश्व हिंदू परिषद की थी। खैर, ये नरेंद्र मोदी का कमाल था। मोदी ने सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों को ही नहीं। अपने विचार से जुड़े संगठनों को भी सत्ता के रास्ते में रोड़ा बनने पर उखाड़ना शुरू कर दिया। लेकिन, ये अचानक मैं क्यों याद कर रहा हूं। दरअसल एक समय में राम मंदिर आंदोलन या देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीतिक हावी हुई तो, विहिप, बजरंग दल में काम करने वाले बीजेपी से भी ज्यादा उसकी राजनीति में प्रभावी दिखने लगे। कई भगवाधारी बाबा विहिप के प्रभाव से लोकसभा, विधानसभा का टिकट पाकर वहां भी धर्म ध्वजा फहराने लगे।

महाकुंभ 2013 का प्रतीक चिन्ह

दरअसल ये अचानक मुझे याद इसलिए आया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद महाकुंभ 2013 का लोगो जारी किया है। हालांकि, इसमें महाकुंभ होने जैसा कहीं से भी दिख नहीं रहा है। क्योंकि, कुंभ तो, हर साल होता है। जबकि, महाकुंभ हर 12 साल पर होता है। प्रयाग के 2001 वाले महाकुंभ से मैं शुरुआती दिनों  वाले पत्रकार के तौर पर जुड़ा था। और, मुझे याद है कि सुबह के स्नान से रात की लीला के कवरेज करने के अलावा एक बेहद महत्वपूर्ण स्थान हुआ करता था। विश्व हिंदू परिषद का पंडाल। उसी पंडाल में 2001 के महाकुंभ में धर्म संसद हुई थी। बड़ी महत्वपूर्ण धर्म संसद थी। मुझे याद है कि मैंने धर्म संसद पर दूसरे पत्रकारों की तरह नजर गड़ा कर रखी थी। महत्वपूर्ण साधु-संतों महंतों का जमावड़ा विश्व हिंदू परिषद के पंडाल में लगा रहता था। लेकिन, 2013 के महाकुंभ में शायद ही किसी को विहिप के पंडाल की उतनी फिक्र बने। शायद ही कोई धर्म संसद हो और अगर हो भी तो, शायद ही उसका कुछ असर प्रदेश, देश की राजनीति पर बन पाए। वजह क्या हो सकती है। 12 साल में इतनी जबरदस्त अप्रासंगिकता। कहा जाता है कि समय के साथ सबको चलना ही होता है अगर, समय के साथ याद रहना है तो। नरेंद्र मोदी से बेहतर उदाहरण शायद ही इस बात का कोई हो। नरेंद्र मोदी हिंदू हृदय सम्राट थे। 11-12 सालों में मोदी विकास के प्रतीक बन गए। इसका चुनावी परिणाम तो, 20 दिसंबर को ही पता चलेगा। लेकिन, सर्वे-संकेत तो, मोदी की शानदार जीत की बात कह रहे हैं। और, इलाहाबाद के अखबारों में विहिप की खबर कहीं नहीं हैं। हां, नए महामंडलेश्वरों के अलग नगर बसाने की खबर जरूर है। सही है गंगा, यमुना, सरस्वती में 12 साल में बड़ा पानी बह गया।


3 Comments

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · December 13, 2012 at 7:28 am

महाकुंभ के प्रबंधकों ने अपना दृष्टिकोण इस साधारण ‘लोगो’ के माध्यम से व्यक्त कर दिया है। वे इसे एक सामान्य कुम्भ मेला के रूप में देखना और संचालित करना चाहते हैं। इसे महाकुम्भ का दर्जा तो अपार संख्या में जुटने वाले स्नानार्थी देते हैं जो महाकुंभ के अवसर पर पचासगुना बढ़ जाते हैं। जब एक-डेढ़ करोड़ लोग इलाहाबाद पहुँचेंगे तो इन प्रबंधकों के पसीने छूट जाएंगे। हम तो ईश्वर से यही मना रहे हैं कि कोई बड़ी दुर्घटना न होने पाये।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · December 13, 2012 at 7:30 am

महाकुंभ के प्रबंधकों ने अपना दृष्टिकोण इस साधारण ‘लोगो’ के माध्यम से व्यक्त कर दिया है। वे इसे एक सामान्य कुम्भ मेला के रूप में देखना और संचालित करना चाहते हैं। इसे महाकुम्भ का दर्जा तो अपार संख्या में जुटने वाले स्नानार्थी देते हैं जो महाकुंभ के अवसर पर पचासगुना बढ़ जाते हैं। जब एक-डेढ़ करोड़ लोग इलाहाबाद पहुँचेंगे तो इन प्रबंधकों के पसीने छूट जाएंगे। हम तो ईश्वर से यही मना रहे हैं कि कोई बड़ी दुर्घटना न होने पाये।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी · December 13, 2012 at 7:32 am

महाकुंभ के प्रबंधकों ने अपना दृष्टिकोण इस साधारण ‘लोगो’ के माध्यम से व्यक्त कर दिया है। वे इसे एक सामान्य कुम्भ मेला के रूप में देखना और संचालित करना चाहते हैं। इसे महाकुम्भ का दर्जा तो अपार संख्या में जुटने वाले स्नानार्थी देते हैं जो महाकुंभ के अवसर पर पचासगुना बढ़ जाते हैं। जब एक-डेढ़ करोड़ लोग इलाहाबाद पहुँचेंगे तो इन प्रबंधकों के पसीने छूट जाएंगे। हम तो ईश्वर से यही मना रहे हैं कि कोई बड़ी दुर्घटना न होने पाये।

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