जब ओलंपिक खेलों में दुनिया के खिलाड़ियों को लंबी-लंबी, मजबूत टांगों पर गोल्ड मेडल की तरफ लपकते हुए देखता हूं तो, हमेशा लगता है कि हमारे खिलाड़ी इन खेलों में चैंपियन क्यों नहीं हो सकते। बार-बार दुनिया के तर्क-कुतर्क आते रहते हैं। एक बड़ा सुंदर कुतर्क है कि वहां के खिलाड़ी जलवायु के लिहाज से बेहतर स्थिति में हैं जिससे उनकी मांसपेशियां ज्यादा मजबूत होती हैं। अच्छी जलवायु की ही वजह से विदेशी खिलाड़ियों के ज्यादा क्षमता होने की बात भी बार-बार कही जाती है। लेकिन, इसकी असली वजह आज मुझे ऑफिस पहुंचने पर पता चली जब मैंने कहा कि विश्वनाथन आनंद शतरंज का विश्व चैंपियन बन गया है।

मेरी एक वरिष्ठ सहयोगी ने मुझसे पूछा- शतरंज से कितनी कमाई होती है। ये मैं आंकलन लगाने में जुटा ही था कि उन्होंने तर्क का हथौड़ा जड़ दिया। अपनी बुद्धि से दुनिया जीतने वाले शतरंज चैंपियन विश्वनाथन आनंद के पास सिर्फ एक ब्रांड का विज्ञापन है। जबकि, आंख मूंदकर चौके-छक्के लगाने वाले कल ही क्रिकेट खेलना शुरू करने वाले छोकरे भी जब चैंपियन बने तो, दो-चार ब्रांड्स को उनके नाम पर बिकने का भरोसा हो गया। दरअसल यही असली वजह है कि जो, हमारे खिलाड़ी क्रिकेट के अलावा सारे खेल हार जाते हैं।
क्रिकेट के बहाने ब्रांड तो बिकते ही हैं। हमारे देश में क्रिकेट खिलाड़ियों के बहाने वोट भी आते हैं। आलम ये होता है कि दस से ज्यादा ब्रांड्स को क्रिकेट के नाम पर बेचकर कमाई करने वाले धोनी धुरंधर की टीम आती है तो, मुंबई में एयरपोर्ट से वानखेड़े के रास्ते में तिल रखने की जगह नहीं मिलती। बड़े-बड़े नेता अपना झंडा बैनर लेकर धोनी की टीम की अगुवाई को खड़े थे। लेकिन, किसी को याद है कि एशिया कप जीतकर लौटी भारतीय हॉकी टीम देश के किस एयरपोर्ट पर उतरी थी। वो भी तब जब हॉकी राष्ट्रीय खेल है। लेकिन, क्रिकेट बिजनेस का नेशनल गेम बन गया है।

फिर जब धोनी की टीम पर इनामों की बौछार होने लगी तो, हॉकी खिलाड़ियों को लगा कि हमें तो, कुछ मिला ही नहीं। भूख हड़ताल की धमकी दी और टीवी चैनलों पर दनादन फोनर होने लगे तो, दो-दो लाख रुपए के इनाम का ऐलान हुआ। जोगिंदर की ये गेंद इतिहास बन गई है—–इसी के साथ टीवी के ज्यादातर पैकेज खुले लेकिन, इन चैनलों में भी शायद ही ये किसी को पता होगा कि एशिया कप में जीतने वाला गोल किस भारतीय खिलाड़ी ने दागा था। पूरी टीम के नाम तो, बस टीम के खिलाड़ी ही जानते होंगे। क्रिकेट दुनिया के 12-14 देश खेलते हैं। वो, भी अब बढ़े हैं पहले 6-8 देश मिलकर ही क्रिकेट के नाम पर दुनिया भर लोगों को बनाते रहते थे। उसके फटाफट अवतार यानी 20-20 का विश्व चैंपियन बनकर भारतीय टीम लौटी थी। जबकि, विश्वनाथन आनंद उस शतरंज के विश्व चैंपियन बन गए हैं जो, दुनिया के 161 देशों में खेला जाता है। अच्छा ये रहा कि ताजा-ताजा चके दे इंडिया सीरीज में अखबारों-टीवी चैनलों में विश्वनाथन आनंद को भी जगह मिल गई। अब देखिए आनंद के लौटने पर कैसा स्वागत करते हैं देश के खेल प्रेमी।

क्रिकेट के अलावा जिस खेल को थोड़ी बहुत जगह देश के लोगों के दिल में और मीडिया में मिल पाती है वो, है टेनिस। लेकिन, टेनिस को तवज्जो मिलने के पीछे बड़ी वजह सनसनी का इसमें शामिल होना है। जीहां, टेनिस सनसनी सानिया मिर्जा- इसी नाम से मीडिया और सानिया के चाहने वाले उसे पुकारते हैं। लिएंडर पेस और महेश भूपति के अलावा सानिया मिर्जा ही एक ऐसा नाम है जिसने लॉन टेनिस में विदेशी खिलाड़ियों को धूल चटाई है। ओलंपिक में कांस्य पदक से दशमलव में सेकेंड से पीछे रह गई पी टी ऊषा के बाद कोई खिलाड़ी क्यों नहीं ओलंपिक के ट्रैक पर तिरंगे की इज्जत बचाने के लिए तेज रफ्तार भागता नजर आया। सबका जवाब बस एक ही है कि इन खिलाड़ियों के भरोसे ब्रांड नहीं बिकते हैं। लेकिन, दुनिया में तो, बड़े-बड़े ब्रांड ट्रैक के बादशाहों के नाम पर खूब बिकते हैं। रीबॉक टीम इंडिया के ज्यादातर खिलाड़ियों का स्पॉन्सर है। लेकिन, पी टी ऊषा के रीबॉक क्या किसी दूसरे ब्रांड ने भी एक ढंग का जूता तक नहीं दिया था ।

हाल ये है कि चार साल में होने वाले एक 50-50 वर्ल्ड कप, अब 20-20 वर्ल्ड कप और कुछ दूसरी सीरीज के कुछ दो-चार कप साल में जीतने के लिए करोड़ो दांव पर लग जाते हैं। और, एक साथ एक ओलंपिक मैच में सैकड़ो गोल्ड, सिल्वर और ब्रांज मेडल जीतने के मौके में हमारे भारतीय खिलाड़ी स्टैंड के आसपास नजर भी नहीं आते। हे प्रभु, चमत्कार करो नाम दूसरे खेलों में भी किसी उद्योगपति को प्रसारण अधिकार कैंसल करवा दो। जिससे वो, फुटबॉल लीग, हॉकी लीग, रेस लीग और दूसरे खेलों की लीग शुरू करे। बार-बार ये कहा जा रहा है कि चक दे इंडिया स्पिरिट में भारतीय खिलाड़ी रंगे हुए हैं। लेकिन, असली चक दे स्पिरिट तो तभी होगा जब ओलंपिक खेलों में 100 मीटर के ट्रैक पर कोई खिलाड़ी तिरंगे की इज्जत रख पाए।


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Shrish · October 2, 2007 at 1:41 pm

“क्रिकेट दुनिया के 12-14 देश खेलते हैं। वो, भी अब बढ़े हैं पहले 6-8 देश मिलकर ही क्रिकेट के नाम पर दुनिया भर लोगों को बनाते रहते थे।”

सचमुच खेद का विषय है कि क्रिकेट के सिवा अन्य खेलों के चैपिंयनों को कोई पूछता भी नहीं। विभिन्न खेलों की प्रतिभाओं को समुचित सहयोग नहीं मिलता, इसीलिए देश खेलों में पीछे है।

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