बैंकों
में लंबी कतारें और खाली एटीएम डराने लगे हैं। लेकिन, लालू प्रसाद यादव भी सरकार
के बड़ी नोटों को बंद करके नई नोटों को लाने के फैसले के विरोध में नहीं हैं। ये
सबसे बड़ी खबर है। और ये खबर इसके बाद बनी जब नीतीश कुमार के बीजेपी से नजदीकी
बनाने की खबरों के बीच नीतीश ने लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। इसी से समझ में आ
जाता है कि देश के जनमानस को समझने वाला कोई भी नेता या राजनीतिक दल इस फैसले का
विरोध करने का साहस क्यों नहीं जुटा पा रही है। दरअसल सच भी यही है कि इस फैसले के
विरोध की पुख्ता वजह भी नहीं है। विमुद्रीकरण के सरकार के फैसले ने एक नई बहस खड़ी
कर दी है। कमाल की बात ये है कि विशुद्ध आर्थिक फैसले पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया
राजनीतिक नजरिये से आ रही है। और इससे भी कमाल की बात ये कि राजनीतिक नजरिये से आ
रही प्रतिक्रिया के दबाव में आर्थिक नजरिये से आ रही प्रतिक्रिया की चर्चा तक नहीं
हो रही है। सबसे बड़ी आलोचना सरकार के इस फैसले की 2 मूल वजहों से हो रही है। पहली,
देश कतार में खड़ा है, आम लोगों को बहुत परेशानी हो रही है। सरकार को पहले से बेहतर
इंतजाम करना चाहिए था। दूसरी वजह ये कि काला धन रखने वालों पर सिर्फ पुराने नोट
बंद कर देने से बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है। सरकार काला धन रखने वालों पर और
कड़ाई क्यों नहीं कर रही है। विशुद्ध राजनीतिक नजरिये से इसकी समीक्षा करना, समझना
देश के इतने बड़े फैसले के समय और ज्यादा जरूरी हो जाता है। अब इसमें तो किसी को
भी एतराज नहीं है कि बड़े नोटों को बंद करने का फैसला समय की जरूरत के लिहाज से
बेहद जरूरी था। क्योंकि, भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी हो गई है। कितनी
बड़ी इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था 2
ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की है। और एक सामान्य अनुमान के मुताबिक, कम से कम 20
प्रतिशत भारत की समानांतर काले धन की अर्थव्यवस्था चल रही है। विश्व बैंक का
अनुमान है कि भारत में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था जीडीपी के 27 प्रतिशत से
ज्यादा है। और कई लोग ये भी मानते हैं कि भारत में पिछले एक डेढ़ दशक में काले धन
की समानांतर अर्थव्यवस्था जीडीपी के करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यानी करीब 1
ट्रिलियन डॉलर की। इसका आधार भी है कि यूपीए सरकार के समय 12 लाख करोड़ रुपये से
ज्यादा के घोटाले सामने आए। जाहिर है घोटाले की रकम अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से
सफेद धन के तौर पर तो आने से रही। इस आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी का
50 प्रतिशत की एक काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है। लेकिन, सबसे कम
यानी 20 प्रतिशत के आंकड़े को ही लेते हैं। इस आधार पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में
460 बिलियन डॉलर यानी 30 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की काले धन की अर्थव्यवस्था
है। भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, इसे समझने के लिए ये थाईलैंड
और अर्जेंटीना जैसे देशों की पूरी अर्थव्यवस्था से ज्यादा है। इतना ही नहीं भारत
सरकार का कुल बजट यानी साल भर खर्च करने की रकम 16 लाख करोड़ रुपये की ही है। इस
पर एक तर्क बार-बार आता है कि अर्थव्यवस्था में नकद के रूप में काला धन बहुत कम
है। ज्यादातर काला धन सोना, रियल एस्टेट और विदेशों में लगा हुआ है। लेकिन, इस
तर्क को रखते समय जानकार इस बात का जिक्र करना भूल जाते हैं कि दरअसल सोना, रियल
एस्टेट या विदेशों में जाकर काला धन होने वाली रकम पहले नकद के रूप में ही सफेद से
काला धन बनती है। इसको और बेहतर तरीके से समझें तो अकाउंटेड से अनअकाउंटेड मनी हो
जाती है। यानी सरकार की रकम लोग इस्तेमाल तो कर रहे होते हैं लेकिन, उस रकम पर
किसी तरह की उत्पादकता नहीं होती है। और इसका उससे भी बुरा असर ये होता है कि
ईमानदारी से कमाई करने वाले पीछे छूटते जाते हैं। हर साल भारतीय अर्थव्यवस्था के
बढ़ने की खबर के साथ एक और खबर आती है कि भारत में अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ती
जा रही है। उसकी सबसे बड़ी वजह यही काला धन है। इन तथ्यों के बाद इसक कदम की जरूरत
पर सवाल खड़ा करना बेहद कठिन हो जाता है।
इतना तो
तय है कि इससे सबसे ज्यादा फायदा गरीब और मध्यमवर्ग के लोगों को ही होने जा रहा
है। वित्त मंत्री अरुण जेटली जब ये कहते हैं कि इससे अमीर-गरीब के बीच की खाई कम
होगी, तो ये तथ्यों के साथ जुड़ता है। लेकिन, इस पर विरोध में एक बड़ा तर्क आता है
कि काला धन रखने वाले नकद से आगे दूसरे तरीके खोज रहे हैं या चुके हैं, जिससे कि
काले धन को खपाया जा सके। साथ ही ये भी सरकार सिर्फ इसी फैसले से काला धन खत्म
नहीं कर सकती। इस विरोध को तो खुद प्रधानमंत्री भी मान रहे हैं। विमुद्रीकरण पर
बीजेपी संसदीय समिति की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ किया है कि
बड़े नोटों को खत्म करने का फैसला काला धन को खत्म करने के लिए शुरुआत भर है। और
ये काला धन खत्म करने की सरकार की प्रतिबद्धता के लिए उठाए गए दूसरे कदमों के साथ एक
बड़ा कदम है। अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। इसलिए ये विरोध भी सिर्फ विरोध के
लिए ही किया गया लगता है। एक बात और जो कतार में लगे लोगों को देखते हुए कही जाती
है कि सरकार की सही तैयारी न होने से ये कतार अभी अगले कम से कम 6 महीने खत्म नहीं
होने वाली है। इसकी वजह बताई जाती है कि 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के 500 और
1000 के नोट बंद हुए हैं। इनकी जगह नए नोट लाए जाने हैं। क्योंकि, सरकार की महीने
की नोट छापने की क्षमता 2 लाख करोड़ रुपये से कुछ ज्यादा ही नोट छापने की है। इस
लिहाज से 14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के नोट छापने में कम से कम 6 महीने लगेंगे,
वो भी पूरी क्षमता के साथ भारत सरकार के छापेखाने काम करेंगे तब। लेकिन, इस तर्क
में भी काफी गड़बड़ है। गड़बड़ कहां है मैं बताता हूं भारतीय रिजर्व बैंक नोट
मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड, जो अब तक 1000 के नोट छापता रहा है, अभी 2000 के नोट छाप
रहा है। 2 शिफ्ट में काम होने पर 133 करोड़ नोट छापा जा सकता है। और अगर 3 शिफ्ट
में ये काम करे, तो 200 करोड़ नोट छापे जा सकते हैं। यानी करीब साढ़े छे लाख करोड़
रुपये के 2000 के नोट 2 महीने में छापे जा सकते हैं। सरकार ये काम इसलिए
कर सकती है क्योंकि, सरकार ने नोट बैंक तक पहुंचाने का पहले का 21 दिन का समय
घटाकर 6 दिन कर दिया है। इससे इस सरकार के किसी काम को करने की तेजी आसानी से समझा
जा सकता है। यहां एक तथ्य ये भी समझना जरूरी है कि 2000 के नोट इस फैसले को लागू
करने की तारीख यानी 8 नवंबर से भी पहले से छापे जा रहे थे। इसलिए प्रधानमंत्री के
बार-बार 50 दिन मांगने के पीछे सरकार की तैयारी साफ नजर आती है। हां, ये जरूर है
कि 500 के नोट बाद में छापना शुरू करने की वजह से 500 मूल्य की नकदी में थोड़ा
ज्यादा समय लग सकता है। इन तथ्यों से इतना तो तय है कि प्रधानमंत्री ने देश के
इतिहास का ये सबसे बड़ा फैसला पूरी तैयारी के साथ लिया है। हां, इसकी वजह से आम
जनता को होने वाली दिक्कतों से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन, जनता इसीलिए सरकार
के फैसले के साथ खड़ी दिखती है क्योंकि, उसे लम्बे समय में अपना ज्यादा फायदा दिख
रहा है।
इतनी
परेशानी भरा फैसला सरकार ने क्यों लिया, इसकी वजहें हमनें समझने की कोशिश की है।
अब ये समझते हैं कि आखिर इससे आम लोगों को, अर्थव्यवस्था को और सरकार को किस तरह
से फायदा होने वाला है। मोटे तौर पर 3 बड़े फायदे साफ दिख रहे हैं। काला धन बाहर
आएगा या पूरी तरह से अर्थव्यवस्था से ही बाहर हो जाएगा। जिससे असल अर्थव्यवस्था की
मजबूती होगी। दूसरा काला धन बनने पर तत्काल प्रभाव से बड़ी रोक लगेगी। हालांकि,
इसका रुकना पूरी तरह से सरकार के इस फैसले को लागू करने के तरीके से तय होगा। तीसरी
बड़ी बात ये होगी कि सरकार के पास कर के रूप में बड़ी रकम आएगी। इसे विस्तार में
समझें तो कर चोरी करके कमाई गई बड़ी रकम फिर से अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेगी और
इस पर लोगों को कर देना होगा। जिससे सरकारी खाते में रकम बढ़ेगी और इसी कर की रकम
से ही देश के सारे तरक्की के काम होते हैं। और इसी आधार पर जीडीपी में भी बढ़त
होगी। आधुनिक अर्थव्यवस्था के मानकों पर एक देश के आगे बढ़ने की सबसे जरूरी शर्तों
में यही है कि देश के लोग बेहतर कमा सकें और उस पर ईमानदारी से कर दें। जिससे उस
कर को सरकार फिर से देश की तरक्की में लगाए और लोगों को नया रोजगार मिले। इस
प्रक्रिया में ही देश की संपत्ति बनती है और इस पूरी प्रक्रिया से जीडीपी तय होता
है। माना जा रहा है कि विमुद्रीकरण की इस प्रक्रिया से एक राष्ट्र के तौर पर भारत
के मजबूत होने की कहानी एक जनवरी से काफी हद तक नजर आने लगेगी। सरकार का पूरा जोर ज्यादा
से ज्यादा लोगों को बैंकिंग के दायरे में लाना है। जनधन योजना और हर तरह की
सब्सिडी सीधे खाते में देने के पीछे भी यही मूल विचार है। उसे आधार से जोड़कर
ज्यादातर रकम को नकदी हस्तांतरण से बाहर निकालने की कोशिश है। ये होता भी दिख रहा
है। तेजी से लोग इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल वॉलेट की तरफ बढ़ रहे हैं। एसोचैम के
मुताबिक, 2022 तक भारत में 30 हजार करोड़ रुपये का कारोबार मोबाइल वॉलेट के जरिये
होगा। ये अगर हुआ तो आने वाले दिनों में सरकार को कम नकदी छापने की जरूरत पड़ेगी।
लम्बे समय में ये भी एक बड़ी सफलता होगी। एक और लक्षण साफ दिख रहा है कि आने वाले
समय में ब्याज दरें घटने वाली हैं। लोगों को और उद्योगपतियों को आसानी से सस्ता
कर्ज देने के लिए बैंकों के पास ढेर सारी रकम आ गई है। साथ ही काले धन की
अर्थव्यवस्था पर चोट पड़ने से जरूरी सामानों के दाम की कीमत भी सही स्तर पर आएगी। यानी
महंगाई में भी कमी देखने को मिलेगी। महंगाई सिर्फ खाने-पीने के सामानों में ही
नहीं कम होगी। आम लोगों का घर खरीदने का सपना भी पूरा हो सकता है। सबसे ज्यादा
काला धन रियल एस्टेट क्षेत्र में ही लगा हुआ है। वो काला धन कम होगा तो इससे घरों
का सस्ता होना तय है। बैंकिंग और रियल एस्टेट पर देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति
दीपक पारेख का कहना है कि ये बहुत ही शानदार फैसला है। इससे कम से कम आधा से एक
प्रतिशत ब्याज दरें घटेंगी। पारेख का ये भी कहना है कि भारत ऐसी मजबूत स्थिति में
कभी नहीं रहा है। महंगाई कम होने और आसानी से कर्ज मिलने से उद्योगों को भी नए
प्रोजेक्ट शुरू करने में आसानी होगी। और इसका सीधा असर लोगों को मिलने वाले नए
रोजगार के तौर पर होगा। भ्रष्टाचार में बड़ी कमी तुरंत आती दिख रही है और अगर आगे
सरकार ने इस मामले में कड़ाई बरती तो भ्रष्टाचार करने वालों को डर लगेगा।
भ्रष्टाचार में आई कमी से विदेशी कंपनियां भी भारत में निवेश के लिए तैयार होंगी। साथ
ही सरकारी दफ्तरों से चलने वाली फाइलों की रफ्तार में तेजी आएगी। कुल मिलाकर भारत
में कारोबार करना आसान हो जाएगा। एक बहुत बड़ा फायदा नकली नोट पर रोक लगाने और
आतंकवादियों को इसका इस्तेमाल करने से रोकने में होगा।
नरेंद्र
मोदी पर सबसे बड़ा आरोप यही लग रहा है कि बिना तैयारी के इतना बड़ा, जनता को
परेशानी में डालने वाला फैसला थोप दिया गया। सरकार की किसी तरह की तैयारी नहीं थी।
एटीएम मशीनों को पूरी तरह से दुरुस्त न करने और अब इतने दिन बीतने के बाद भी एटीएम
में रकम न होने से इस आरोप को मजबूत किया जा सकता है। लेकिन, नोटों को ले जाने में
लगने वाला समय घटाने, हर कुछ दिन में फैसले में लगातार होने वाले संशोधन को इस
नजरिये से देखा जा सकता है कि सरकार जनता की परेशानी कम करने के साथ ही काले धन को
सफेद बनाने की नई व्यवस्था पर रोक लगाने की भी हर सम्भव कोशिश कर रही है। फिर वो
कर कानून में संशोधन हो या फिर जनधन खाते से 10 हजार रुपये से ज्यादा रकम निकालने
पर रोक लगाना हो। देश की आर्थिक नीति, नजरिये के साथ सामाजिक नीति, नजरिये में भी
बदलाव की ये पक्की बुनियाद है। जिसके बेहतर आर्थिक परिणाम 1 अप्रैल 2017 से शुरू
होने वाली तिमाही से दिखने लगेंगे। संयोगवश यही वो तारीख है जब सरकार अब तक का
सबसे बड़ा कर सुधार जीएसटी लागू करने जा रही है।

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