JNUSU में जीत से वामपन्थियों का उत्साह हिलोरे ले रहा है। आसमान पर हैं वामपन्थी, इस समय। वामपन्थियों की राजनीति एक खास तरह की है। उस राजनीति में दूसरे पर सन्देह बढ़ाकर अपना भरोसा बढ़ाया जाता है। गौरी लंकेश की हत्या और अब जेएनयू में छात्रसंघ चुनाव जीतकर वामपन्थी फिर सन्देह का दायरा बढ़ाने की कोशिश में जुट पड़े हैं।

सन्देह का दायरा
सन्देह में जी रही जनता के लिए
नेता तलाशना मुश्किल होता है

सन्देह में जी रही जनता के लिए
स्वाभिमानी होना मुश्किल होता है

सन्देह में जी रही जनता के लिए
सही-गलत का फर्क कर पाना मुश्किल होता है

सन्देह में जी रही जनता के लिए
हर दक्षिणपन्थी को गोडसे कहना आसान होता है

सन्देह में जी रही जनता के
सरोकार छीनकर, खुद सरोकारी बन बैठना आसान होता है

सन्देह में जी रही जनता को
हम ही सरकार हैं, समझाना आसान होता है

सन्देह में जी रही जनता
मान लेती है कि लेखक, पत्रकार वामपन्थी ही होता है

सन्देह में जी रही जनता के लिए
सालों सन्देह में ही निकाल देना उसकी नियति बन जाता है

ये सन्देह का दायरा बड़ा हो गया है
इतना कि, पुणे से बैंगलुरू तक एक ही हथियार से हत्या होना मान लेता है
इसी सन्देह के दायरे को बढ़ाने की राजनीति
फिर मजबूत करने की कोशिश चल रही है

दाभोलकर, पन्सारे, कलबुर्गी के बाद अब
गौरी लंकेश के जरिये सन्देह बढ़ाया जा रहा
हत्यारे नहीं पकड़ने हैं
बस इस पर सन्देह का माहौल बनाए रखना है

सन्देह की राजनीति के आधार पर ही जनता,
आजादी को भी किसी पार्टी की दी हुई जागीर मान लेती है
उसी जागीर को सन्देह के जरिये
हासिल करने की कोशिश चल पड़ी है

सन्देह का दायरा बहुत बड़ा
करने की कोशिश फिर चल पड़ी है

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