ईश्वरीय सत्ता को लेकर हमेशा मैं भ्रम में रहता हूं। इसकी शायद सबसे बड़ी वजह उस सत्ता को लेकर धरती पर गजब का पाखण्ड होना है। लेकिन, नियति और नियन्ता कोई तो होगा ही। ऐसी घटनाएं जब होती हैं, तो मानना ही पड़ता है। कुकर फटा, उसके साथ चिमनी क्षत-विक्षत हो गई। रसोईघर में उस समय पत्नी के अलावा कामवाली आन्टी भी थीं। संयोग देखिए कि छोटी सी खंरोच भी नहीं आई किसी को। जबकि, बहुत बड़ा रसोईघर भी नहीं है। धमाके से बढ़ी धड़कन अब तक सामान्य नहीं हो सकी है। सिहरन अन्दर तक है। फ्लैट में सबके दरवाजे बन्द होने से शायद पड़ोसियों को भी इसका अन्दाजा न हो पाया हो या कई बार सोसाइटी में इतने तरह की तोड़-फोड़, धमाके होते रहते हैं कि वो बार-बार कहां देखने जाएं कि क्या हुआ। हमारे ठीक नीचे के फ्लैट वाली रुबीना जी को इस धमाके की आवाज सुनाई दी, वो भागती हुई आईं। मैंने बताया- सब कुशल है। पता नहीं, इसका एहतियात क्या हो सकता है। वैसे तो कुकर हमेशा से ही मुझे वाहियात बर्तन लगता है। लेकिन, अब इसे एकदम से हटाना तो सम्भव शायद ही हो। लेकिन, कुकर पुराना होते ही हटा देना एक तरीका हो सकता है।

आधुनिक चिमनी शायद दुर्घटना रोकने में काम आई। सबकुछ उसी ने झेल लिया। ट्यूबलाइट फट गई। चूल्हे का स्टैण्ड टुकड़े-टुकड़े हो गया है। सब साफ करके हटाने के बाद की ये तस्वीरें हैं। ऐसे लग रहा है, जैसे बस बहुत बुरा होने से बच गया। ये सबके जीवन में होता होगा। सत्य से साक्षात्कार जैसा और अपनी हैसियत कौड़ी की भी नहीं है, ये भी पता चलता होगा। फिर भी कैसे किसी दूसरे का बुरा करने की बाकायदा योजना हम बना पाते हैं। संस्कार, परिवार और हर रिश्ते की शुभकामना से सब कुशल है।